किताबें, हमारी सच्ची मित्र

Edited By Updated: 23 Apr, 2026 04:09 AM

books our true friends

अच्छी पुस्तकों से श्रेष्ठ मित्र शायद ही कोई हो! संस्कारित करने, कौशल निखारने से लेकर भावनात्मक बुद्धिमता की नींव रखने तक किताबों की भूमिका अपरिहार्य है। पुस्तकें पढऩे से न केवल आत्म-जागरूकता बढ़ती है, बल्कि हमारी सोच को भी सही आकार मिलता है। ज्ञान...

अच्छी पुस्तकों से श्रेष्ठ मित्र शायद ही कोई हो! संस्कारित करने, कौशल निखारने से लेकर भावनात्मक बुद्धिमता की नींव रखने तक किताबों की भूमिका अपरिहार्य है। पुस्तकें पढऩे से न केवल आत्म-जागरूकता बढ़ती है, बल्कि हमारी सोच को भी सही आकार मिलता है। ज्ञान में अप्रत्याशित वृद्धि होने के साथ-साथ, अपने आसपास की दुनिया को एक नए दृष्टिकोण से देखने-समझने की सोच भी विकसित होती है। बर्नार्ड शॉ के अनुसार, ‘विचारों के युद्ध में किताबें ही अस्त्र होती हैं।’

गुणवत्तापूर्ण साहित्य पढऩे से जहां मानसिक तनाव घटता है, वहीं ज्ञान का प्रकाश समूचे तौर पर व्यक्तित्व का कायाकल्प भी कर सकता है। पुस्तकों की इसी विशेषता के मद्देनजर, ब्राजील में कैदियों के लिए एक अनूठा रीङ्क्षडग प्रोग्राम चलाया गया है, जिसे ‘पढऩे के माध्यम से मुक्ति ’ कहा जाता है। इसके अंतर्गत, किसी किताब को पढ़कर, समीक्षा करने से सजा कम होगी। आमतौर पर एक किताब की समीक्षा पर 4 दिन की राहत मिलती है, एक वर्ष में अधिकतम 48 दिन की सजा घट सकती है। इस अभियान का उद्देश्य जहां बंदियों की सजा में कटौती करना अथवा उन्हें तनाव मुक्त बनाना है, वहीं उससे भी कहीं अधिक अच्छी पुस्तकों द्वारा शिक्षित करके उनका व्यवहार सुधारना है, ताकि कालान्तर में एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर उन्हें मुख्यधारा में वापस लाना आसान हो।

अंग्रेजी के लेखक जोसेफ एडिसन एक जगह लिखते हैं, ‘पढऩा मन और शरीर दोनों के लिए एक व्यायाम है।’ निश्चय ही, इस कथन में कोई अतिशयोक्ति  नहीं। किताबें, अखबार आदि पढऩे की आदत से जहां भाषा समृद्ध होती है, वहीं उच्चारण भी शुद्ध होता है। कल्पनाशीलता को असीम आकाश मिलता है, एकाग्रता तथा स्मरणशक्ति  में आश्चर्यजनक बढ़ौतरी होती है। यहां तक कि ‘डिजिटल शिक्षा मॉडल’ को दुनिया का भविष्य मान चुके विद्वजनों को भी किताबों के संबंध में अपनी सोच का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ा। दरअसल, विगत कुछ वर्षों में हुए शोधों, अनुभवों तथा सीखने के परिणामों के दौरान शिक्षा नीति निर्माताओं, शिक्षकों तथा अभिभावकों ने पाया कि तकनीकी उपयोग से पढ़ाई भले ही सरल हो गई हो, किंतु ज्ञान की सहज उपलब्धता ने बच्चों के बुनियादी कौशल भी कमजोर कर डाले। स्वीडन में हुआ एक शोध स्क्रीन पर पढऩे वाले छात्रों की एकाग्रता तथा गहराई से समझने की क्षमता कम होने का तथ्य उजागर करता है। यही कारण है कि विश्व की सबसे अधिक डिजिटल शिक्षा प्रणालियों में गिने जाने वाले फिनलैंड, स्वीडन जैसे देश एकबारगी फिर किताब, कागज तथा पैन की ओर लौट रहे हैं। कई देशों में मोबाइल फोन, टैबलेट इत्यादि के उपयोग को सीमित अथवा प्रतिबंधित किया जा रहा है।

पढऩे-लिखने से मस्तिष्क की सक्रियता बनी रहती है, जोकि विभिन्न रोगों की रोकथाम में मददगार सिद्ध होती है। निरंतर अध्ययन का शौक भूलने की बीमारी से 40 फीसदी तक बचाव कर सकता है। अक्सर बुढ़ापे में याद्दाश्त खोने तथा मानसिक कमजोरी (डिमेंशिया) की समस्या से जूझना पड़ता है लेकिन इस संदर्भ में हुआ एक शोध जीवन भर पढऩे, लिखने तथा नई भाषाएं सीखने जैसी बौद्धिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले लोगों में डिमेंशिया का खतरा कम होने का खुलासा करता है। शोध के अनुसार, दिमाग को जितना व्यस्त रखेंगे, अल्जाइमर जैसी बीमारियों को उतना ही पीछे धकेल पाएंगे। शिकागो की रश यूनिवॢसटी मैडिकल सैंटर की शोधकत्र्ता एंड्रिया जमिट के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में पाया गया कि मानसिक स्वास्थ्य केवल बुढ़ापे की आदतों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह जीवन भर के बौद्धिक परिवेश से प्रभावित होता है। 

शोधकत्र्ताओं ने लगभग 1,939 बुजुर्गों पर 8 साल तक नजर रखी। इनकी औसत आयु 80 वर्ष के करीब थी। निष्कर्षों में सामने आया कि जो लोग बचपन से लेकर बुढ़ापे तक किताबों, समाचार-पत्रों, पुस्तकालयों तथा भाषा सीखने जैसे कार्यों से जुड़े रहे, उनमें अल्जाइमर का खतरा उन लोगों की तुलना में 38 फीसदी कम था, जो इन गतिविधियों में कम सक्रिय थे। मानसिक रूप से सक्रिय लोग औसतन 94 वर्ष की आयु में अल्जाइमर के शिकार हुए, जबकि सक्रिय न रहने वालों में ये लक्षण 88 वर्ष में ही दिखने लगे। डॉ. जमिट की मानें तो सीखने की ललक पैदा करने वाले कार्यक्रम, जैसे- लाइब्रेरी तक पहुंच तथा शुरुआती शिक्षा व्यवस्था डिमेंशिया के मामलों को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने कहा, हालांकि, यह अध्ययन पूरी तरह से कारण-प्रभाव साबित नहीं करता, लेकिन इसे एक बड़ी उम्मीद माना जा रहा है। अकेले भारत में साल 2036 तक डिमेंशिया मरीजों की संख्या 1.7 करोड़ तक पहुंचने की आशंका व्यक्त  की गई है, ऐसे में पढऩा-लिखना एक सरल एवं प्रभावी बचाव का रास्ता हो सकता है। 

कुल मिलाकर, अच्छा साहित्य गुणों में पारस पत्थर से किसी प्रकार भी कम नहीं, जो लोहे को भी कंचन बनाने का पूर्ण सामथ्र्य रखता है। किताबों का महत्व आंकते हुए एक बार लोकमान्य तिलक ने भी कहा था, ‘किताबों में वह शक्ति होती है, जो नरक को स्वर्ग बना देती है।’ आज जब समाज में नैतिक मूल्यों का पतन चरम पर है, ऐसे में देश के भविष्य को बाल्यकाल से ही अच्छी सामग्री के पठन-पाठन का अभ्यस्त बनाना अत्यधिक जरूरी जान पड़ता है। सही दिशा ज्ञान ही स्वच्छ सामाजिक वातावरण के निर्माण की राह प्रशस्त कर सकता है और इस विषय में अच्छी किताबों से बड़ा मार्गदर्शक भला कौन होगा?-दीपिका अरोड़ा
 

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