किफायतशारी को एक सामाजिक संस्कृति बनाना होगा

Edited By Updated: 18 May, 2026 03:48 AM

frugality must become a social culture

तभी सफल हो सकती है, जब यह सांझी की जाए। यदि देश से ईंधन बचाने, अनावश्यक खर्च कम करने और संयम से रहने के लिए कहा जा रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों पर नहीं डाली जा सकती। इसकी शुरुआत शासन करने वालों से होनी चाहिए, इसका विस्तार हर संस्थान...

तभी सफल हो सकती है, जब यह सांझी की जाए। यदि देश से ईंधन बचाने, अनावश्यक खर्च कम करने और संयम से रहने के लिए कहा जा रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों पर नहीं डाली जा सकती। इसकी शुरुआत शासन करने वालों से होनी चाहिए, इसका विस्तार हर संस्थान तक होना चाहिए और इसे घरों, दुकानों, स्कूलों और कार्यस्थलों में रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनना चाहिए। 

नरेंद्र मोदी ने वैश्विक अनिश्चितता के समय में संसाधनों, विशेष रूप से ईंधन बचाने की आवश्यकता के बारे में बात की है। युद्धों, अस्थिर अंतर्राष्ट्रीय बाजारों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ, बचाए गए ईंधन का हर एक लीटर मायने रखता है। भारत अपने तेल का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक घटनाओं का असर मुद्रास्फीति (महंगाई), परिवहन लागत और दैनिक खर्चों के माध्यम से सीधे भारतीय घरों तक पहुंचता है। बचत करने का यह आह्वान व्यावहारिक है लेकिन इसे पूरी तरह से स्वीकार किए जाने के लिए, यह उन लोगों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए जो नियम बनाते हैं।

भारत में, जनता अपने शासकों के बारे में सब कुछ नोटिस करती है। नागरिक हमेशा इसे खुलकर नहीं कहते लेकिन वे देखते हैं। वे काफिले में कारों की संख्या, छोटे आयोजनों के लिए ली जाने वाली उड़ानें, आधिकारिक गैस्ट हाऊस, दलबल और सत्ता में बैठे लोगों की जीवनशैली पर ध्यान देते हैं। पहले के समय में ऐसी कई चीजें अनदेखी रह जाती थीं। सोशल मीडिया सब कुछ रिकॉर्ड कर लेता है। एक तस्वीर, एक वीडियो, एक पोस्ट मिनटों में पूरे देश में फैल सकती है।  युवा भारतीय जब निष्पक्षता देखते हैं तो वे राष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन करने के लिए तैयार रहते हैं। लेकिन वे दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाने में भी तत्पर रहते हैं। अगर उनसे पैट्रोल बचाने, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने और कम खर्च करने के लिए कहा जाए, जबकि सत्ता में बैठे लोग लंबे काफिलों और मुफ्त उड़ानों के साथ यात्रा करना जारी रखें, तो संदेश अपनी विश्वसनीयता खो देता है। यही कारण है कि किफायतशारी की शुरुआत शीर्ष से होनी चाहिए। मंत्रियों, नौकरशाहों और वरिष्ठ अधिकारियों को प्रत्यक्ष उदाहरण सैट करने चाहिएं। आधिकारिक कारों को कम, बड़े काफिलों को सीमित किया जाना चाहिए। सरकारी आयोजन सरल होने चाहिएं। कार्यालयों में ऊर्जा के उपयोग को नियंत्रित किया जाना चाहिए। 

एक नेता संयम का विकल्प चुन सकता है लेकिन यदि 10 सहायक वाहन चलते रहेंगे, तो बचत गायब हो जाएगी। हवाई यात्रा इसके सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है। उड़ानों का उपयोग अक्सर नियमित बैठकों, छोटी उपस्थिति और ऐसे आयोजनों के लिए किया जाता है जो आसानी से ऑनलाइन हो सकते हैं। कुछ मामलों में, सुविधा के लिए निजी विमान या चार्टर्ड यात्रा का उपयोग किया जाता है। किफायतशारी की अवधि के दौरान, इसकी समीक्षा की आवश्यकता है। एक रद्द की गई आधिकारिक यात्रा सैंकड़ों परिवारों द्वारा एक छोटी कार यात्रा को कम करने की तुलना में अधिक ईंधन बचा सकती है।

लग्जरी पर भी ध्यान देने की जरूरत है। मुफ्त आवास, महंगी आधिकारिक मेहमाननवाजी, अनावश्यक विदेशी दौरे, औपचारिक खर्च और विशेष यात्रा विशेषाधिकार, ये सभी जनता की राय को आकार देते हैं। इन्हें करदाताओं द्वारा वित्तपोषित किया जाता है। किफायतशारी केवल सरकार तक ही सीमित नहीं हो सकती, इसे एक सामाजिक संस्कृति बनना होगा। एक परिवार का ईंधन बचाना छोटा लग सकता है, एक करोड़ परिवारों का ऐसा करना राष्ट्रीय तस्वीर को बदल देता है। बच्चे संभव होने पर पास में पैदल जा सकते हैं। कारपूङ्क्षलग आम हो सकती है। घरों और स्कूलों के बाहर इंजनों को चालू नहीं छोड़ा जाना चाहिए। माइलेज सुधारने के लिए वाहनों का बेहतर रखरखाव किया जा सकता है। ये व्यावहारिक बदलाव हैं, बलिदान नहीं। घर अप्रयुक्त लाइटों, पंखों और उपकरणों को बंद करके बिजली बचा सकते हैं। एयर कंडीशनर का उपयोग समझदारी से किया जा सकता है। पानी के पंपों और हीटरों को अधिक कुशलता से प्रबंधित किया जा सकता है। शहरों और कस्बों में कई दुकानें अनावश्यक लाइटिंग चालू छोड़ देती हैं। जैनरेटर तब भी चलते हैं जब उनकी आवश्यकता नहीं होती। बाजार संघ सांझा संरक्षण प्रयास बना सकते हैं। स्कूलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। कम उम्र में बनी आदतें जीवन भर रहती हैं। स्कूल बच्चों को सिखा सकते हैं कि ईंधन और ऊर्जा का संरक्षण केवल पैसे के बारे में नहीं, बल्कि यह एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है। सांझा स्कूल परिवहन और जागरूकता कार्यक्रम इन विचारों को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं। 

सामाजिक कार्यक्रम एक और क्षेत्र है। शादियों, उत्सवों और निजी समारोहों में अक्सर वाहनों, लाइटिंग और जैनरेटर का अत्यधिक इस्तेमाल शामिल होता है। एक सरल शैली खुशी को कम किए बिना संसाधनों को बचा सकती है। मुख्य मुद्दा विश्वास का है। नागरिक तब सहयोग करने के लिए तैयार होते हैं जब उन्हें विश्वास होता है कि बलिदान सांझा किया जा रहा है। देखना ही मायने रखता है। सोशल मीडिया यह सुनिश्चित करता है कि हर कार्रवाई को प्रलेखित किया जाए, उसकी तुलना की जाए और उस पर चर्चा की जाए। भारत ने पहले भी सामूहिक बलिदान देखा है-युद्ध के समय, कमियों और राष्ट्रीय संकटों में। वे प्रयास इसलिए सफल हुए क्योंकि लोगों का मानना था कि हर कोई योगदान दे रहा है। सांझा अनुशासन एकता पैदा करता है। असमान बलिदान अविश्वास पैदा करता है। प्रधानमंत्री का संदेश एक अस्थायी निर्देश से कहीं अधिक बन सकता है। यह एक राष्ट्रीय लोकाचार बन सकता है। किफ़ायतशारी गरिमा को कम करने के बारे में नहीं है। यह जिम्मेदारी बढ़ाने के बारे में है।-देवी एम. चेरियन
 

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