Edited By Ramkesh,Updated: 18 May, 2026 06:18 PM

राजस्थान हाईकोर्ट ने रेप के मामले की सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणी की है। जस्टिस अनूप कुमार ढंड की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब पत्नी बालिग है ( यानी की 18 साल से ऊपर ) तो पति के खिलाफ रेप का मामला नहीं बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि एक ही...
नेशनल डेस्क: राजस्थान हाईकोर्ट ने रेप के मामले की सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणी की है। जस्टिस अनूप कुमार ढंड की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब पत्नी बालिग है ( यानी की 18 साल से ऊपर ) तो पति के खिलाफ रेप का मामला नहीं बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि एक ही केस में दहेज और रेप का आरोप कैसे हो सकता है ये कानून का दुरुपयोग है। कोर्ट ने सवाल किया क्या एक ही समय में कोई महिला किसी पुरुष की पत्नी भी हो सकती है और रेप पीड़िता भी हो सकती है?
शादी वैध तो रेप नहीं
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की पीठ ने कहा कि साफ शब्दों में व्यवस्था दी है कि यदि शादी वैध है और विवाह के समय पत्नी बालिग (18 वर्ष से ऊपर) थी, तो पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा किसी भी सूरत में नहीं बनता। कोर्ट ने पति के खिलाफ रेप के दर्ज मुकदम को रद्द कर दिया। तल्ख टिप्पणी की कि 'फैशन' बन चुकी ऐसी फिजूल की मुकदमेबाजी के कारण ही अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा है और असली पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हो रही है।
जानिए पूरा मामला
दरअसल, एक महिला ने पति से विवाद के बाद उसके ऊपर दहेज उत्तपीड़न, रेप जैसे गंभीर आरोप में केस दर्ज कराया था। मामला राजस्थान की हाई कोर्ट में पहुंचा। इस मामले की सुनवाई जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने की। उन्होंने पाया कि ये केस सिर्फ बदले की भावना में दर्ज कराया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि जब किसी पुरुष पर दहेज का मामला दर्ज कराया है जा रहा है तो कैसे उस पर रेप का केस दर्ज होगा। जब शादी बैध है तो रेप का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून का मजाक न बनाए ऐसे लोगों की वजह से ही पीड़ित व्यक्ति को सही समय पर न्याय नहीं मिल पाता है। पति के खिलाफ दर्ज रेप के मुकदमे को रद्द कर उसे बरी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ढाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ' मामले का हवाला देते हुए याद दिलाया कि न्यायपालिका की पवित्रता बनाए रखना सबका कर्तव्य है। कोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है कि वैवाहिक विवादों को आपसी सहमति या सही कानूनी तरीके से सुलझाया जाना चाहिए, न कि कानून को बदला लेने का औजार बनाकर।