ईरान में नरसंहार और वैश्विक दोहरे मापदंडों की सड़ांध

Edited By Updated: 22 Jan, 2026 05:25 AM

genocide in iran and the rot of global double standards

ईरान में हालिया नरसंहार किसी आकस्मिक राजनीतिक उथल-पुथल का नतीजा नहीं है। यह एक सुनियोजित, वैचारिक और मजहब आधारित सतत ङ्क्षहसा का विस्तार है, जो कभी समाप्त नहीं होती। इस त्रासदी में अधिक भयावह वह वैश्विक चुप्पी है, जिसे अक्सर मानवाधिकार, लोकतंत्र और...

ईरान में हालिया नरसंहार किसी आकस्मिक राजनीतिक उथल-पुथल का नतीजा नहीं है। यह एक सुनियोजित, वैचारिक और मजहब आधारित सतत ङ्क्षहसा का विस्तार है, जो कभी समाप्त नहीं होती। इस त्रासदी में अधिक भयावह वह वैश्विक चुप्पी है, जिसे अक्सर मानवाधिकार, लोकतंत्र और अंतरात्मा की दुहाई देने वाला कुटिल वर्ग जानबूझकर साधे रहता है। इस मामले में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की प्रतिक्रिया भी उसी वैश्विक पाखंड का हिस्सा है। दुनिया के सबसे ताकतवर पद पर बैठा व्यक्ति यदि हर अंतर्राष्ट्रीय संकट को सौदेबाजी और तात्कालिक लाभ के चश्मे से देखे, तो उससे नैतिकता की अपेक्षा करना स्वयं को धोखा देना है। ईरान में गिरती लाशों पर ट्रम्प के वक्तव्य न तो संवेदनशील हैं, न ही उनमें लोकतंत्र बहाली का कोई संकल्प दिखता है-यदि कुछ है, तो वह केवल स्वार्थ है।

निहत्थे ईरानी जिस साहस के साथ इस्लामी तानाशाही के विरुद्ध खड़े रहे, वह आधुनिक इतिहास का एक करुण और गौरवपूर्ण अध्याय है। 17 जनवरी को स्वयं सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई द्वारा यह स्वीकार करना कि इस्लामी शासन-विरोधी प्रदर्शनों में ‘कई हजार लोग’ मारे जा चुके हैं, वह मजहबी रक्तपात की भयावहता का एक और प्रतिरूप है। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि जब मुसलमानों की हत्या किसी इस्लामी शासन के हाथों होती है, तब एक विशेष संगठित आक्रोश कहां गायब हो जाता है? गाजा में इसराईली सेना द्वारा मुसलमानों की मौतों और कश्मीर में मोदी सरकार के आतंकवाद-अलगाववाद विरोधी अभियानों पर आसमान सिर पर उठा लेने वाला स्वयंभू बुद्धिजीवी कुनबा ईरान में मुसलमानों के नरसंहार पर मौन क्यों है? 

दरअसल, यह वही दोहरा मापदंड है, जिसने आज के नैतिक विमर्श को सड़ांध से भर दिया है। इस्लाम के नाम पर गैर-मुसलमानों से घृणा, उनके पूजास्थलों का विखंडन और हिंसा (हत्या सहित) सदियों से जारी मजहबी उपक्रम है, जिसे वर्षों से तथाकथित उदारवादियों द्वारा भ्रामक रूपी ‘प्रतिक्रिया’ की आढ़ में जायज ठहराने का प्रयास किया जा रहा है। इसी में मुसलमानों के दमन और यहां तक कि उनके कत्ल पर इसी समूह द्वारा चुप्पी तब साध ली जाती है, जब हत्यारा हम-मजहबी या विशुद्ध इस्लामी शासनतंत्र हो। तब ऐसा व्यवहार किया जाता है, मानो मानवता को कोई चोट ही न पहुंची हो, मानो रक्त केवल रंग हो और करुणा सिर्फ वैचारिक विकल्प। इससे अधिक नैतिक पतन और बौद्धिक दरिद्रता और क्या हो सकती है? भारत में वामपंथियों, तथाकथित उदारवादियों और महिला अधिकार समूहों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। जो वर्ग छोटी-छोटी घटना (गाजा सहित) पर अक्सर सड़कों पर उतर आता है, वह ईरान में महिलाओं के दमन में असामान्य रूप से चुप है। यही नहीं, श्रीलंका, नेपाल और बंगलादेश में सत्ता-परिवर्तन का प्रयोग अपने देश में दोहराने की कामना करने वाले भी पूरी तरह शांत हैं। 

इस पाखंड के दो स्पष्ट कारण हैं। पहला-ईरान में मुस्लिम नरसंहार उस सुविधाजनक नैरेटिव के मुताबिक नहीं है, जिसमें हर अत्याचार का दोष अक्सर तथाकथित ‘हिंदू फासीवाद’, ‘युद्धोन्मादी यहूदी’ या ‘अमरीकी साम्राज्यवाद’ पर मढ़ा जाता है। दूसरा-ईरान में इस्लामी व्यवस्था का जन्म वामपंथियों और मुल्ला-मौलवियों के गठजोड़ से हुआ था। 5 दशक पहले माक्र्सवादी तूदेह पार्टी और अन्य वाम गुटों ने तत्कालीन ईरानी राजा मोहम्मद रजा पहलवी के विरुद्ध मजहबी आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई थी। इसलिए वामपंथी समूह अपने सहयोग से स्थापित इस्लामी तंत्र की क्रूरता पर खामोश है।

वर्ष 1978 तक ईरान एक आधुनिक और अपेक्षाकृत उदार समाज था। पहलवी का अधिनायकवादी शासन चरित्र से बहुत हद तक सैकुलर रहा, जिसमें महिलाओं को शिक्षा-मताधिकार प्राप्त था और सत्ता-अधिष्ठान मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था। पश्चिमी देशों से बढ़ती नजदीकी के कारण पहलवी के खिलाफ वामपंथियों ने इस्लामी कट्टरपंथियों से हाथ मिलाया और ‘क्रांति’ के नाम पर जनता को यह विश्वास दिलाया कि इस्लामी शासन ही मुक्ति का मार्ग है। परिणाम वही हुआ, सत्ता पर मुल्ला-मौलवियों का कब्जा और ‘काफिर-कुफ्र’ का सफाया।
ईरान 1979 के बाद आग से निकलकर भ_ी में जा गिरा। विश्वविद्यालय बंद हो गए, तो छात्र संगठन प्रतिबंधित और यहां तक कि वामपंथी विचारकों को जेलों में ठूंस दिया गया। महिलाओं को आधुनिक जीवन से बाहर निकालकर मजहबी पुलिस के माध्यम से मध्ययुगीन काल में धकेल दिया गया। पाकिस्तान और बंगलादेश इस प्रयोग के जीवित प्रमाण हैं, जहां अल्पसंख्यकों का तीव्र क्षरण, महिलाओं का बढ़ता दमन और अंतहीन सांप्रदायिक हिंसा का काला इतिहास है।

पाकिस्तान में जारी सुन्नी-शिया संघर्ष सिद्ध करता है कि एक निश्चित और संकीर्ण पहचान पर बना देश अपने भीतर विविधता को सहन नहीं कर सकता। यदि डोनाल्ड ट्रम्प को वाकई लोकतंत्र-मानवाधिकारों की चिंता होती, तो वह पाकिस्तान से निकटता नहीं बढ़ाते, जहां गैर-मुसलमानों के साथ मुस्लिमों (शिया-अहमदिया सहित) को भी दीन के नाम पर प्रताडि़त और बलूच-सिंधी आदि विद्रोहियों का दमन किया जा रहा है।

आज भी वही भारत-विरोधी शक्तियां देश में 1947 जैसी पटकथा दोहराने का प्रयास कर रही हैं। सी.ए.ए. विरोधी ङ्क्षहसक प्रदर्शन से लेकर कथित किसान आंदोलन और नूपुर शर्मा आदि प्रकरण तक इसके उदाहरण हैं। यह ठीक है कि वे अब तक सफल नहीं हुए लेकिन भारत को पुन: तोडऩे के प्रयास अब भी जारी हैं। वही ईरान की त्रासदी वैश्विक दोहरे मापदंडों, वैचारिक अंधेपन और नैतिक पाखंड का प्रतिङ्क्षबब है।-बलबीर पुंज  
 

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