पर्यावरण व स्वास्थ्य का नुकसान औद्योगिक व आॢथक समृद्धि के लिए हानिकारक

Edited By Updated: 21 Feb, 2026 03:42 AM

harmful to environment and health harmful to industrial and economic prosperity

इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि देश को आगे बढऩा है तो औद्योगिक उपक्रमों, बड़े कारखानों और व्यापारिक संस्थानों को बढ़ावा देना होगा। इसी के साथ जरूरी यह है कि यदि इसके लिए जन स्वास्थ्य का ध्यान रखे बिना कुछ किया गया तो यह वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए...

इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि देश को आगे बढऩा है तो औद्योगिक उपक्रमों, बड़े कारखानों और व्यापारिक संस्थानों को बढ़ावा देना होगा। इसी के साथ जरूरी यह है कि यदि इसके लिए जन स्वास्थ्य का ध्यान रखे बिना कुछ किया गया तो यह वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए खतरनाक होगा।

प्रक्रिया का पालन और नियमों का उल्लंघन : जब कोई बड़ी परियोजना बनती है तो यह देखा जाता है कि इससे कितने लोगों को रोजगार मिलेगा, गरीबी में कितनी कमी आएगी और कितने पैमाने पर जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होगा। इसके लिए सरकार का उन पाबंदियों को तिलांजलि देना हानिकारक होगा जिनसे लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा होती है, प्रदूषण से बचाव होता है, वनों की गैरजरूरी कटाई नहीं होती और जमीन के उपजाऊ तत्व नष्ट नहीं होते।

पर्यावरण संरक्षण के नियमों के विरुद्ध किया गया औद्योगिक विकास तब बेमानी हो जाता है, जब उससे विषैले पदार्थ पास की नदियों, नालों में बहकर बड़े स्तर पर जल प्रदूषित करते हैं। इसी तरह वायु में धुएं के रूप में विषाक्त कण लोगों की सांस की बीमारियों का कारण बनते हैं तो यह घातक हो जाता है। पर्यावरण का नुक़सान एक बार हुआ तो उसका कोई निदान न होने से जीवन भर के लिए व्यक्ति को इसके कारण हुई परेशानी और बीमारी से जूझना पड़ता है। एक बार वन विनाश हुआ और इससे संबंधित जैविक संपदा नष्ट हुई तो उसे दोबारा प्राप्त करना असंभव है। इसी तरह एक बार बिगड़ा इकोसिस्टम फिर से ठीक नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए यदि बिना सोचे-समझे जंगलों का सफाया होता है तो यह भविष्य के लिए विनाशकारी होगा। 

एक समस्या और है, जिसके कारण अधिकतर परियोजनाएं समय पर पूरी इसलिए नहीं होतीं या उन्हें बीच में ही रोक दिया जाता है क्योंकि कहीं जमीन का अधिग्रहण करने में अनेक वर्ष निकल जाते हैं और कहीं एन.जी.टी. द्वारा उन्हें पर्यावरण के लिए नुकसानदेह मान कर रोक दिया जाता है। यह सुनिश्चित किए बिना कि भूमि अधिग्रहण में कोई बाधा नहीं आएगी और ग्रीन ट्रिब्यूनल के नियमों का पालन हो जाएगा, किसी प्रोजैक्ट को मंजूर कैसे कर दिया जाता है, यह समझ से परे है। 

विकास लेकिन किस कीमत पर : आर्थिक प्रगति, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए कोई भी परियोजना बनाई जाएगी तो वह समय पर तो पूरी होगी ही, साथ में गरीबी, असमानता और बेरोजगारी का हल निकालने में भी सहायक होगी। इससे ही जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी सुधार होगा जैसे कि शिक्षा, साफ जल और स्वच्छता के साधन उपलब्ध होना। इससे सही दिशा में आगे बढऩे में सहायता मिलेगी। इसके अनेक उदाहरण हैं लेकिन हमारे नीति निर्माताओं ने उन पर ध्यान नहीं दिया और उन दुर्घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा। भोपाल गैस त्रासदी, उपहार सिनेमा में हुआ हादसा, तेलंगाना में रासायनिक विस्फोट, दिल्ली में मुंडका फैक्ट्री में हुआ अग्निकांड, कोलकाता में ए.एम.आर.आई. अस्पताल में आग लगना, कोडईकनाल में पारे का रिसाव, विशाखापत्तनम में एक पॉलीमर फैक्ट्री में गैस रिसाव, ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें नियमों की अनदेखी की गई और लाखों लोगों को जीवन भर के लिए अपंग होना पड़ा। न जाने कितनों को अभी तक अपने दैनिक कामकाज में प्रतिदिन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में हो रही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसका कारण सरकारी महकमों में फैला भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भी है।

विकास की परिभाषा : माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि जन स्वास्थ्य और पर्यावरण की कीमत पर कोई भी औद्योगिक विकास नहीं हो सकता। जब तक इनकी सुरक्षा के लिए उचित प्रबंध नहीं किए जाते, तब तक कोई भी गतिविधि नहीं की जा सकती। कर्मचारियों और कामगारों की सेहत का ध्यान रखे बिना कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता। भविष्य में इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होनी चाहिए जिसका असर उस प्रोजैक्ट में काम करने वाले लोगों की सेहत पर हो। यदि सभी आवश्यक कार्रवाई और प्रावधान योजना बनाते समय पूरे कर लिए जाएं तो फिर उसके समय पर पूरा होने में कोई समस्या नहीं होती। 

हमारे यहां ऊर्जा और विद्युतीकरण परियोजनाओं को लेकर अक्सर विवाद होता रहता है। इन्हें स्थापित करने से पहले जल, जंगल और जमीन से जुड़ी सभी समस्याओं पर पहले ही विचार न करने और उनसे होने वाली परेशानियों से निपटने के उपाय न किए जाने से उनके बीच में बंद होने की स्थिति पैदा हो जाती है। यहां एक और बात का जिक्र करना भी आवश्यक है और वह है राजनीतिज्ञों का अनावश्यक दखल, जिनके अपने स्वार्थ होते हैं, जिनके पूरा न होने से विरोध से लेकर श्रमिक आंदोलन तक हो जाता है जिसके कारण बहुत सी लाभकारी योजनाएं ठंडे बस्ते में पड़ जाती हैं। यह न भी हो तो फिर घोटालों का सूत्रपात हो जाता है। भारत ने हाल में बहुत से देशों और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों से करार या समझौते किए हैं जिनकी पूर्ति तब ही हो सकती है, जब हम अपने मानव संसाधनों और उपलब्ध सुविधाओं का सही तरीके से इस्तेमाल करें ताकि कोई हम पर तैयारी न होने का आक्षेप न लगा सके।-पूरन चंद सरीन 
 

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