पुलवामा हमले से उपजा राष्ट्रीय संकल्प

Edited By Updated: 14 Feb, 2026 05:58 AM

national resolve born out of the pulwama attack

14 फरवरी, 2019 के दिन पाकिस्तान के पाले हुए आतंकवादियों में से एक ने आत्मघाती हमलावर बन कर जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय  राजमार्ग पर भारतीय सेना के काफिले पर पुलवामा जिले के लेथपोरा में एक वाहन  में सवार  होकर भीषण आत्मघाती हमला किया था। इस हमले में...

14 फरवरी, 2019 के दिन पाकिस्तान के पाले हुए आतंकवादियों में से एक ने आत्मघाती हमलावर बन कर जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय  राजमार्ग पर भारतीय सेना के काफिले पर पुलवामा जिले के लेथपोरा में एक वाहन  में सवार  होकर भीषण आत्मघाती हमला किया था। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व  पुलिस बल की 76वीं बटालियन के 40 जवान शहीद हो गए। हमलावर पुलवामा जिले का ही रहने वाला पाकिस्तान स्थित इस्लामी आतंकवादी समूह जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा स्थानीय कश्मीरी युवक आदिल अहमद डार था। 

पुलवामा के लेथपोरा क्षेत्र में जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सी.आर.पी.एफ. के 78 वाहनों का काफिला जम्मू से श्रीनगर की ओर बढ़ रहा था और सैंकड़ों जवान (लगभग 2500) ड्यूटी पर लौट रहे थे। दोपहर लगभग 3 बजे आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरी कार को जवानों की बस से टक्कर मार दी। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि आसपास का क्षेत्र दहल उठा। कई जवान मौके पर ही शहीद हो गए और कई गंभीर रूप से घायल हुए। यह केवल एक आतंकी घटना नहीं थी, बल्कि भारत की एकता, सुरक्षा और संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास था। इस कायराना हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया, जबकि पाकिस्तान ने हमेशा की तरह इस हमले के साथ किसी भी तरह का संबंध होने से इंकार किया।   

आतंकवाद का चरित्र कायरतापूर्ण होता है—वह छिपकर वार करता है और निर्दोषों की जान लेता है। पुलवामा ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि सीमा पार से पोषित आतंकवाद केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक चुनौती है। हमले की खबर फैलते ही पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। गांवों और शहरों में लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर और मौन रखकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। जब शहीदों के पार्थिव शरीर उनके गृह राज्यों में पहुंचे, तो हजारों की संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े। हर आंख नम थी, लेकिन हर हृदय में देशभक्ति की भावना प्रबल थी। शहीदों के परिवारों ने अपने प्रियजनों की शहादत पर गर्व व्यक्त करते हुए राष्ट्र  के प्रति अटूट आस्था दिखाई। यह भारतीय संस्कृति और संस्कारों की महानता का प्रतीक है।

इस भीषण हमले में उत्तर प्रदेश के 12, राजस्थान के 5, पंजाब के 4, बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड, बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से 2-2, असम, कर्नाटक, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल, केरल, झारखंड और मध्य प्रदेश से 1-1, कुल मिलाकर 40 वीर जवानों ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर  किए। इस घटना की विश्व भर में निंदा हुई और कई देशों ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत का समर्थन किया। भारत सरकार ने पाकिस्तान को इसका दोषी मानते हुए कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर कड़े कदम उठाए और पाकिस्तान से ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा वापस ले लिया ।

पुलवामा हमले के बाद भारत की मोदी सरकार ने आतंकवाद के विरुद्ध सख्त रुख अपनाया। 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बालाकोट में स्थित आतंकी प्रशिक्षण शिविरों/ ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की। यह कार्रवाई आत्मरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का स्पष्ट संदेश थी। इसके अगले दिन 27 फरवरी को भारत और पाकिस्तान के बीच हवाई तनाव की स्थिति बनी, जिसमें भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को पाकिस्तान ने बंदी बना लिया था। अंतरराष्ट्रीय दबाव और कूटनीतिक प्रयासों के बाद 1 मार्च, 2019 को उन्हें भारत को लौटा दिया गया। मई 2019 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया। इसे भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा गया।

आज, पुलवामा की याद हमें केवल शोक मनाने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प के  लिए भी प्रेरित करती है। आतंकवाद के विरुद्ध कठोरता बरतना आवश्यक है, पर उतना ही आवश्यक है सामाजिक  सौहार्द, युवाओं को सकारात्मक दिशा और विकास की मुख्यधारा से जोडऩा। पुलवामा हमला एक काला अध्याय अवश्य है, परंतु इससे उपजा राष्ट्रीय संकल्प भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह घटना हमें निरंतर सतर्क रहने, सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने और आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग को बढ़ाने की प्रेरणा देती है। शहीदों का बलिदान केवल स्मृति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है—एक सुरक्षित, सशक्त और एकजुट भारत के निर्माण की जिम्मेदारी।-सुरेश कुमार गोयल

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