समाज कल्याण संबंधी कानून ... एक दृष्टिकोण

Edited By Updated: 02 Apr, 2023 04:47 AM

social welfare laws  a viewpoint

सरकार नागरिकों के जीवन संचालन के लिए कई प्रकार के नियमों का संचालन करती रहती है तथा जिनका उचित पालन न करना व्यक्तियों के लिए दंडनीय होता है। सामाजिक कानून व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों को निश्चित करने व सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही बनाए...

सरकार नागरिकों के जीवन संचालन के लिए कई प्रकार के नियमों का संचालन करती रहती है तथा जिनका उचित पालन न करना व्यक्तियों के लिए दंडनीय होता है। सामाजिक कानून व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों को निश्चित करने व सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही बनाए जाते हैं। 

समाज में समरसता व सामंजस्य बैठाने के लिए समय-समय पर कई प्रकार के विधि-विधान बनाए गए हैं तथा इन कानूनों के कार्यान्वित होने से कमजोर व दलित वर्ग के लोगों के साथ हो रहे शोषण में पर्याप्त सीमा तक अंकुश लगाया गया है। कानून का कार्य समाज की रक्षा, संरक्षण और बचाव करना होता है। 

सामाजिक कानून का उद्देश्य समाज में उन लोगों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में सुधार और सुरक्षा के लिए बनाए गए वे नियम हैं जो जाति, लिंग, शारीरिक व मानसिक दोष या आर्थिक शक्ति की कमी के कारण अपने लिए स्वरूप व सभ्य जीवन स्तर प्राप्त नहीं कर सकते। उदाहरणतया सन् 1829 में सती प्रथा निरोधक कानून, 1856 में पुनर्विवाह अधिनियम 1955 में अस्पृश्यता के विरुद्ध कानून, वर्ष 1961 में दहेज विरोधी कानून, 1983 में महिला उत्पीडऩ विरोधी कानून व 2005 में घरेलू हिंसा निरोधक कानून  इत्यादि बनाए गए हैं। इसी तरह वर्ष 1989 में अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निरोधी कानून बनाया गया।

ऐसे लोग जिनका पिछले काफी लम्बे समय से शोषण होता चला आ रहा था, उनकी सुरक्षा व संरक्षण के लिए कड़े से कड़े नियम बनाने की जरूरत थी ताकि कानून के डर से असमर्थ, असहाय व पीड़ित लोग स्वतन्त्रता व निडरता से अपना जीवन व्यतीत कर सकें। कानून के साथ-साथ समाज में कई प्रकार के जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं ताकि लोगों में भाईचारे की भावना का उत्सर्जन किया जा सके। यह बात भी ठीक है कि विभिन्न प्रकार के कानूनों का पुलिस व कोर्ट कचहरियों द्वारा पीड़ित वर्ग के लोगों द्वारा नाजायज इस्तेमाल भी  होता आ रहा है जिसके परिणाम स्वरूप ऐसे में बनाए गए सभी कानून अपना उद्देश्य पूर्ण नहीं कर पा रहे हैं। 

यह बात भी ठीक है कि जब-जब भी किसी प्रकार का अतिक्रमण होता है तब-तब सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय अपना वांछित हस्तक्षेप  करती आई हैं मगर विधायिका जो सरकार का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, कानून  बनाते समय कई बार उस कानून की प्रासंगिकता व यथार्थवादिता पर अपना उचित ध्यान नहीं दे पाती तथा परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अपराधी सजा मुक्त होने में कामयाब हो जाते है। 

इस संबंध में यह लिखना उचित है कि वर्ष 2021 में कुल सजा दर 57 प्रतिशत थी जबकि अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम के अन्तर्गत सजा की दर केवल सात प्रतिशत थी। इसी तरह स्त्री क्रूरता की धारा 498 प्रतिशत में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत यह दर मात्र 15 प्रतिशत थी। न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार यदि तथ्यों में थोड़ी भी संशय वाली स्थिति हो तो कानून के सिद्धांतों के आधार पर अपराधी को संशय का लाभ मिल ही जाता है तथा वह सजा मुक्त हो जाता है। इन सभी बातों का संज्ञान सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर लिया है मगर फिर भी कभी-कभी न्यायालय के निर्देशों की उचित पालना नहीं होती है। 

बाबा साहिब अम्बेदकर ने वर्ष 1930-31 में अपनी आवाज उठाई थी कि इस वर्ग को चुनावों में पृथक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जोकि वर्ष 1932 के पूना समझौते के अंतर्गत दिया भी गया था। संविधान में भी उन्होंने इन जातियों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण आगामी दस वर्षों तक जारी रखने का प्रावधान रखा था। मगर जैसा कि विदित है कि ऐसे मामलों में सजा की दर बहुत ही कम है तथा 90 प्रतिशत मामले आपसी समझौते या फिर पर्याप्त तथ्यों के अभाव में समाप्त हो जाते हैं। 

यह बात बिल्कुल सत्य है कि कुछ राज्यों में दलित वर्ग के लोगों को इंसान नहीं समझा जाता था तथा उनके साथ क्रूरता व अत्याचार की सारी सीमाएं लांघ दी जाती थीं। मगर समय के साथ-साथ इस एक्ट का भी  कहीं न कहीं दुरुपयोग होने लगा तथा दीवानी मामलों या फिर छोटी-मोटी बातों पर भी उच्च जाति के लोगों के विरूद्ध मामले दर्ज होने लग पड़े। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय हम सभी के मौलिक अधिकारों का संरक्षक है तथा एक याचिका के आधार पर वर्ष 2018 में निर्णय दिया गया कि किसी भी ऐसी शिकायत का संज्ञान जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा लिया जाएगा जोकि सात दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच करवाएगा तथा सच्चाई जानने के बाद ही मुकद्दमा दर्ज किया जाएगा। इसी तरह लोक सेवक के विरुद्ध यदि उसके आधिकारिक कार्य के कारण  कोई निम्न जाति का कनिष्ठ लोक सेवक शिकायत करता है तब उस व्यक्ति के नियुक्ति अधिकारी द्वारा जांच किए जाने के बाद ही कानूनी कार्रवाई की जाएगी। 

इसके साथ-साथ उच्चतम न्यायालय ने ऐसे अपराधों को भी 438 भारतीय दंड प्रक्रिया के अधीन लाकर अग्रिम जमानत दिए जाने का निर्णय भी सुनाया मगर यह फैसला उचित नहीं माना गया तथा केन्द्र सरकार को इस एक्ट में फिर से संशोधन करना पड़ा तथा ऐसे मामलों में पहले की तरह ही संज्ञान लिए जाने के बारें में निर्णय लिया गया। आज कमजोर वर्ग व स्त्री वर्ग के साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध सभी नागरिकों विशेषतय: बुद्धिजीवी वर्ग  को जागरूक हो कर अपना दायित्व निभाना चाहिए ताकि इन लोगों के आंसुओं को पोंछा जा सके तथा इस वर्ग के लोगों को या इनके द्वारा दी गई शिकायतों को  किसी पूर्वाग्रह या बदले की भावना से नहीं देखना चाहिए।-राजेन्द्र मोहन शर्मा डी.आई.जी.(रिटायर्ड)

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