Edited By ,Updated: 03 Jan, 2026 05:55 AM

भारत प्राकृतिक संसाधनों से इतना समृद्ध और सुंदर है कि दुनिया के बहुत से देश इस कारण ही हमसे ईर्ष्या करते हैं।
भारत प्राकृतिक संसाधनों से इतना समृद्ध और सुंदर है कि दुनिया के बहुत से देश इस कारण ही हमसे ईर्ष्या करते हैं।
पैसे की भूख और लालच : उत्तर में हिमालय, जो आयु के हिसाब से कम है लेकिन अगर वह न होता तो क्या होता, कल्पना तक नहीं की जा सकती। इसी तरह विंध्यांचल, सतपुड़ा, पूर्वी और पश्चिमी घाट और सबसे पुरानी अरावली पर्वत शृंखला देश की रक्षा ही नहीं, बल्कि अथाह संपत्ति अर्जित करने का साधन है। जब लालच की सीमा न रहे और धन कमाने पर कोई रोक न हो तो प्रकृति का दोहन और उसकी लूट शुरू हो जाती है। परिणाम प्रदूषण, सूखा, अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी आपदाओं के रूप में निकलता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने ही फैसले को वापस लेने की बात कोई साधारण नहीं है, क्योंकि इससे मरणासन्न या खोखली हो चुकी पहाडिय़ां बच गईं और इनकी गोद में पल रहे असंख्य जीव-जंतुओं ने भी चैन की सांस ली होगी, वरना उनका अंत निश्चित था।
सामान्य व्यक्ति के लिए इतना ही समझना काफी है कि एन.सी.आर. में पूरे साल वायु प्रदूषण की मुसीबत का एक बड़ा कारण यही है। पहाडिय़ां कटती हैं, मिट्टी और धूल के गुबार उठते हैं और आसमान का रंग बदल जाता है, नीचे धरती पर सांस लेने के लिए शुद्ध हवा का अकाल पड़ जाता है। ट्रकों से निकलता जहरीला धुआं और यह धूल-धक्कड़ इतना उत्पात मचाते हैं कि कब बिन बुलाए मौत आ जाए या उम्र कितनी कम हो जाए, पता ही नहीं चलता। सही उपाय न किए गए, पर्यावरणविदों, भूवैज्ञानिकों और अन्य भुक्तभोगी लोगों की बात अनसुनी करने का रवैया बदला नहीं गया और कुछेक ठेकेदारों, पूंजीपतियों के लोभ पर कड़े प्रतिबंध नहीं लगाए गए, तो यह विनाशलीला यूं ही जारी रहेगी।
विनाश की कथा : पहाडिय़ां कटने से थार मरुस्थल का प्रवेश आसान हो जाता है, इधर उत्तर से बेरोकटोक ठंडी हवाएं चलने से प्रदूषण और सर्दी का प्रकोप मिलकर इन क्षेत्रों में ऐसा दृश्य पैदा कर देता है जो जानकारों के मुताबिक उन्होंने अपने जीवन में कभी घटते हुए नहीं देखा। यह जानना जरूरी है कि दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरण की रीढ़ है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में सबसे बड़ा हिस्सा अनेक नदियों, वन्य प्राणियों, अभयारण्यों, जैव विविधता और भूजल को रिचार्ज करने का प्राकृतिक गुण और फैलने के लिए तैयार रेगिस्तान के सामने एक अभेद्य दीवार की तरह ये अरावली पहाडिय़ां हैं। इसे ध्यान में रखकर ही 1600 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर प्रोजैक्ट ‘ग्रेट ग्रीन वाल ऑफ अरावली’ बनाया गया और 135 करोड़ पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया।
यह ठीक है कि परिवहन और आवागमन के साधनों का निर्माण आधुनिक भारत में आवश्यक है लेकिन प्रश्न यह है कि यह किस कीमत पर हो? क्या वन विनाश इसलिए सही है कि हमें घर बनाने के लिए जमीन चाहिए और सजाने के लिए पेड़ों की कटाई से मिली लकड़ी या टिम्बर की जरूरत है? उत्तराखंड और हिमाचल में अब पहले जैसा पर्यावरण नहीं है, उत्तर-पूर्वी भारत के प्रदेश अपने सौंदर्य और प्राकृतिक संसाधनों को खोते जा रहे हैं। अब बर्फ पडऩा, वर्षा होना और नदियों में पानी का घटना-बढऩा स्वाभाविक नहीं रहा, बिन मौसम बारिश और हिमपात यही बताता है कि प्रकृति हमसे हमारी हिमाकत का बदला ले रही है और इंसान को उसकी औकात बता रही है।
जरूरत और लालच का अंतर : उदाहरण के लिए, हम अपनी नदियों के गंदा होने के बारे में ङ्क्षचतित होते हैं और सरकार सैंकड़ों करोड़ उन्हें साफ करने में लगा देती है लेकिन वे हैं कि साफ ही नहीं रहतीं। इतनी सी बात है कि जब तक पर्वत और पहाडिय़ों से जरूरत से ज्यादा अर्थात गैर-कानूनी खनन होता रहेगा और नदियों में मिट्टी जमा होती रहेगी, न वे साफ होंगी और न ही बाढ़ का तांडव रुकेगा। जरूरत जब लोभ बन जाए तो ऐसा ही होता है। अगर संतुलन बना कर और सस्टेनेबल तरीके से काम किया जाए तो न केवल इन्फ्रा सैक्टर को फायदा होगा, बल्कि रोजगार भी बढ़ेगा। यह समझिए कि जेन जी की भाषा में ईको फ्रैंडली लाइफस्टाइल होगा जो आधुनिक पीढ़ी के लिए वरदान है। इसके लिए अरावली ही नहीं, देश में स्थित सभी पर्वत शृंखलाओं को सुरक्षित रखने की मुहिम चलानी होगी और यदि कोई विरोध करे तो उसके सामने मानव कंकाल रख दीजिए और कहिए कि यही उसका वर्तमान जीवन है। कानून हैं, लेकिन वे केवल सजावटी बंद किताब के पन्नों में कैद हैं।
प्रकृति की इस हत्या का हत्यारा कौन है? क्या उसे सजा देने के लिए कोई कानून है? अभी तक तो नहीं। अरावली की पहाडिय़ों के बीच से गुजरना कभी बहुत सुकून भरा होता था लेकिन अब खुले आसमान से बिना किसी रुकावट के सीधे सूर्य की किरणों की लपट का सामना करना पड़ता है। बारिश हो गई तो ठिकाना तो दूर, काई, कीचड़ और दलदल जैसा माहौल बन जाता है। जरा सोचिए, वर्तमान यह है तो आने वाला कल कैसा होगा?-पूरन चंद सरीन