Edited By ,Updated: 03 Oct, 2026 05:30 AM

पर्यटन कभी भी केवल सरकार का कोई एक विभाग नहीं रहा और न ही यह कभी हो सकता है। किसी भी यात्री द्वारा की जाने वाली प्रत्येक यात्रा एक जटिल बुनियादी ढांचे के सहारे चलती है-सरकारें और स्थानीय प्रशासन, एयरलाइंस और परिवहन प्रदाता, होटल और होमस्टे, टूर...
पर्यटन कभी भी केवल सरकार का कोई एक विभाग नहीं रहा और न ही यह कभी हो सकता है। किसी भी यात्री द्वारा की जाने वाली प्रत्येक यात्रा एक जटिल बुनियादी ढांचे के सहारे चलती है-सरकारें और स्थानीय प्रशासन, एयरलाइंस और परिवहन प्रदाता, होटल और होमस्टे, टूर ऑप्रेटर और गाइड, तकनीकी प्लेटफॉर्म और कंटैंट क्रिएटर, कारीगर और उद्यमी, इन सबसे बढ़कर वे स्थानीय समुदाय, जिनका जीवन, परंपराएं और परिदृश्य किसी भी गंतव्य को उसका विशेष चरित्र प्रदान करते हैं। इसलिए, सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ गंतव्यों का प्रचार करना ही नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसी परिस्थितियां तैयार करना है, जिनमें यह संपूर्ण इकोसिस्टम फल-फूल सके।
भारत आज अपनी पर्यटन यात्रा के एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। आज का पर्यटक केवल स्मारकों को देखने की इच्छा नहीं रखता, बल्कि ऐसे अनुभवों की तलाश में है, जो उम्र भर याद रहें। स्थानीय खान-पान, जीवंत परंपराएं, संगीत, हस्तशिल्प, प्रकृति, होमस्टे और स्थानीय समुदायों के साथ जुड़ाव अब पारंपरिक दर्शनीय स्थलों की यात्रा जितना ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है। यह बदलाव पर्यटन के प्रति हमारी सोच और दृष्टिकोण में भी उसी के अनुसार परिवर्तन की मांग करता है।
भारतीय पर्यटन में हाल के भागीदारियों के अनुभव हमारे सामने मौजूद व्यापक संभावनाओं को दर्शाते हैं। पर्यटन मंत्रालय ने तकनीक, परिवहन, आतिथ्य, कंटैंट और डिजिटल आऊटरीच की क्षमताओं को जोडऩे के लिए उद्योग जगत और अन्य हितधारकों के साथ सक्रिय भागीदारी बढ़ाई है। ऐसी भागीदारियां न केवल इसलिए मूल्यवान हैं, क्योंकि वे ‘इन्क्रेडिबल इंडिया’ के दायरे को विस्तार देती हैं, बल्कि इसलिए भी, कि वे प्रेरणा को पहुंच से और पहुंच को वास्तविक अनुभव से जोड़ती हैं। वाराणसी का उदाहरण इस संदर्भ में विशेष रूप से प्रेरणादायक है। किसी गंतव्य को केवल स्मारकों के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव के रूप में पेश किया जा सकता है, जिसमें गंगा, शास्त्रीय संगीत, विरासत, बनारसी बुनाई, स्थानीय समुदाय और पारंपरिक आतिथ्य का अद्भुत संगम हो। यही वह दिशा है जिसमें पर्यटन को अब आगे बढऩा चाहिए।
पहला स्तंभ है राजनीतिक इच्छाशक्ति। पर्यटन को किसी एक पर्यटन विभाग की प्रशासनिक सीमाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए ‘संपूर्ण सरकार’ दृष्टिकोण की आवश्यकता है। परिवहन, नागरिक उड्डयन, रेलवे, संस्कृति, शहरी विकास, पर्यावरण, कौशल विकास, वाणिज्य और डिजिटल प्रौद्योगिकी, इन सभी को इस सांझी समझ के साथ एकजुट होना होगा कि किसी भी स्थान को वास्तव में सफल क्या बनाता है। इस संदर्भ में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अर्थ है पर्यटन को केवल एक द्वितीयक आॢथक गतिविधि न मानकर इसे रोजगार, उद्यमिता, सांस्कृतिक संरक्षण, क्षेत्रीय विकास और अंतर्राष्ट्रीय समन्वय के एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में मान्यता देना।
दूसरा आवश्यक तत्व है सार्वजनिक निवेश। पर्यटन अवसंरचना अब केवल हवाई अड्डों, राजमार्गों और होटलों तक सीमित नहीं रह गई। हालांकि ये अनिवार्य हैं, फिर भी आधुनिक यात्री को स्वच्छ सार्वजनिक स्थान, अच्छी तरह से संरक्षित ऐतिहासिक परिसर, इंटरप्रिटेशन सैंटर, उपयुक्त सांकेतिक बोर्ड, पैदल यात्रियों के अनुकूल सुविधाएं, अंतिम छोर तक कनैक्टिविटी, डिजिटल जानकारी और प्रशिक्षित कर्मियों की भी आवश्यकता होती है। अनुभव की गुणवत्ता किसी पर्यटक के स्मारक में प्रवेश करने से बहुत पहले शुरू हो जाती है और उसके वहां से निकलने के काफी समय बाद तक जारी रहती है।
फिर भी एक तीसरा तत्व है, जिसके बिना न तो राजनीतिक इच्छाशक्ति और न ही सार्वजनिक निवेश अपने वादे को पूरा कर सकते हैं-जन भागीदारी। किसी भी स्थान के सच्चे संरक्षक वहां के लोग होते हैं। यदि पर्यटन को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो स्थानीय समुदाय को केवल पर्यटन की कोई वस्तु बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे इसका मुख्य भागीदार और लाभार्थी बनना होगा। होमस्टे, स्थानीय व्यंजन, हस्तशिल्प, लोक प्रस्तुतियां, स्थानीय गाइड और स्थानीय स्तर पर प्रबंधित अनुभव पर्यटन को एक बाहरी आॢथक गतिविधि से बदलकर स्थानीय समृद्धि के स्रोत में परिवर्तित कर सकते हैं।
उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि जब कोई स्थान किसी यात्री की कल्पना में स्थान बनाएए तो उस आकर्षण से उत्पन्न आर्थिक अवसर उन लोगों तक पहुंचे जो उस स्थान को उसकी पहचान देते हैं। गांव का एक युवा गाइड, उद्यमी, फोटोग्राफर या आतिथ्य पेशेवर बनने में सक्षम होना चाहिए। महिला-नेतृत्व वाला उद्यम स्थानीय भोजन या हस्तशिल्प को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक ले जाने में सक्षम होना चाहिए। तभी पर्यटन समावेशी विकास का एक सच्चा जरिया बनता है। भारतीय पर्यटन का भविष्य आखिरकार ऐसे ही संबंधों के ताने-बाने पर तैयार होगा-केंद्र और राज्यों के बीच, सरकार और उद्योग के बीच, प्रौद्योगिकी और परंपरा के बीच, वैश्विक मंचों और स्थानीय समुदायों के बीच और सार्वजनिक निवेश तथा निजी उद्यमों के बीच।-गजेंद्र्र सिंह शेखावत (केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री)