Edited By ,Updated: 06 Sep, 2026 05:49 AM

कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा का इस साल का सीजन 2013 की केदारनाथ यात्रा की याद दिलाता है। नेपाल के रास्ते तिब्बत की ओर बढ़ते यात्रियों के साथ सैंकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग भयानक तबाही में काल के गाल में समा गए। आपदा राहत के लिए भारत समेत कई...
कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा का इस साल का सीजन 2013 की केदारनाथ यात्रा की याद दिलाता है। नेपाल के रास्ते तिब्बत की ओर बढ़ते यात्रियों के साथ सैंकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग भयानक तबाही में काल के गाल में समा गए। आपदा राहत के लिए भारत समेत कई उदार देशों ने सहयोग का हाथ बढ़ाया है। नुकसान की भरपाई के लिए नेपाल के वित्त मंत्री ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए 500 करोड़ डॉलर की मांग अपने सहयोगी देशों से की है। हिमालय के इतने विशाल खंड के टूट कर गिरने के पीछे तिब्बत (चीन) में हुए विकास कार्य से संबंध किसी से छिपा नहीं है। भीषण तबाही रचने के इस अपराध के कारण चीन के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की आवाज भी उठती है।
बिना बारिश के अचानक आई बाढ़ की स्थिति के साथ ही बादल फटने से मचने वाली तबाही की वजह से हिमालय में कोहराम मचा हुआ है। पूर्वोत्तर में असम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों से बाढ़ की खबरें बराबर आ रही हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पश्चिमी हिमालय में बसे हैं। सैलाब की खबरें इन प्रदेशों से भी बराबर आ रही हैं। विकास और आधुनिकता के सपनों के सामने कुदरत का प्रतिकार अपने रौद्र रूप में दिखता है। पानी के रास्ते में अट्टालिकाएं खड़ी करने वाला नगर नियोजन विभाग इनका पुनॢनर्माण कर अगली आपदा की तैयारी करता है।
इस आधुनिकता के सामने लोक (स्थानीय समाज) घुटने टेकने को मजबूर हैं। 21वीं सदी में हमारे सामने कई संकट हैं। भू-राजनीतिक व्यवस्था बदल रही है। तकनीक इंसानी समझ से आगे निकल जाने का खतरा पैदा कर चुकी है। धरती पर जीवन का अस्तित्व खत्म होने का खतरा मौजूद है। चौथी औद्योगिक क्रांति और पोस्ट पैंडेमिक वल्र्ड ऑर्डर को गति देने हेतु रेयर अर्थ मिनरल्स की खोज तिब्बत से लेकर आइसलैंड तक चल रही है। आज चीन और अमरीका समेत दुनिया भर के देश इसमें पूरी निष्ठा से लगे हुए हैं। इसके पहले से तीसरे ध्रुव को जल का सर्वश्रेष्ठ भंडार माना जाता है। चीन ने एशियन वाटर टावर के रूप में इसकी व्याख्या कर इसे खतरनाक हथियार में तबदील करने का लक्ष्य साध लिया है। हिमालय की व्यथा के नाम पर ट्रांस हिमालयन फोरम आरंभ करता है। वर्चस्व स्थापित करने की चीनी रणनीति में इसकी अहमियत है।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की राजनीति : भारत समेत 8 देशों ने मिल कर ङ्क्षहदूकुश और हिमालय के विकास के लिए 80 के दशक में प्रयास शुरू किया था। चीन और बंगलादेश के साथ नेपाल, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी इसमें शामिल हैं। काठमांडू में इसका मुख्यालय बनाया गया। लेकिन चीन की पर्यावरण रक्षा इतने से पूरी नहीं होती। इसलिए ट्रांस हिमालयन फोरम शुरू किया गया। इसके सामने फ्रांस के साथ मिल कर भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सोलर अलायंस शुरू किया। भारत गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन कोआपरेशन फोरम से चीन को दूर रखता है। इनमें बहुपक्षीय सांझीदारों ने जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी संतुलन जैसे मुद्दों को इन मंचों पर उठाया है। इनके साथ संयुक्त राष्ट्र और इसके विभिन्न घटक लगातार सक्रिय हैं। द्विपक्षीय राजनयिक संबंध का इतिहास इससे भी पुराना है। दरकते हिमालय को बचाने के लिए सभी प्रतिबद्धता का दावा कर रहे हैं।
अपने देश में गंगा के पूजन का रिवाज है। नेपाल में बागमती और चीन में यैलो रिवर की संतानें संकट में हैं। बिहार के तमाम नेता आज फरक्का बैराज तोडऩे की बात पर आमादा हैं। लेकिन इसी गंगा पर सरहद पार बंगलादेश में बैराज बनाने का काम चल रहा है। दोनों देशों के बीच गंगा जल संधि को 12 दिसम्बर को 30 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इसके नवीनीकरण की प्रक्रिया में कई सवाल उठते हैं। जल पर कब्जा करने के इस दौर में नदी को ही खारिज किया जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो नीति निर्माता निचले क्षेत्र से पानी रोकने की अपील का जवाब देते। इस प्रश्न से मुंह फेर कर तोता नारा लग रहा, ‘अविरलता बिन गंगा निर्मल नहीं’! आज हिमालय और गंगा की नैसॢगकता को सहेजना ही सबसे आवश्यक है। इसके अभाव में गंगा, यमुना, गंडक, बागमती और कोसी जैसी नदियों के लिए अस्मिता का संकट बना रहेगा।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी का संकट खड़ा करने के लिए आज दोषियों की पहचान कर सजा देने की जरूरत है। 80 के दशक में पर्यावरण कार्यकत्र्ता, पत्रकार और विशेषज्ञों ने मिलकर यू.के. को भरपाई के लिए मजबूर किया था। पावर स्टेशनों से होने वाले प्रदूषण से नॉर्वे और पश्चिमी जर्मनी के जंगलों और झीलों को नुकसान पहुंचा था। शुरू में अंग्रेजों ने इस आरोप से इंकार कर विवाद खड़ा किया था। पर कई सालों के विवाद और बहस के बाद उन्हें अपनी जिम्मेदारी माननी पड़ी और अरबों पाऊंड का भुगतान किया था। दुनिया के समने इस अपराध के दोषी को माफी मांगनी और नुकसान की भरपाई करनी चाहिए। इससे पर्यावरण कार्यकत्र्ताओं, पत्रकारों और विशेषज्ञों को सफलता मिलेगी।-कौशल किशोर