सरकारी स्कूलों की संख्या कम हुई, लेकिन घबराने की बात नहीं

Edited By Updated: 07 Sep, 2026 05:11 AM

the number of government schools has decreased but there is no need to panic

जून 2026 में नीति आयोग की एक रिपोर्ट सामने आने के बाद से, सार्वजनिक बहस में एक जाना-पहचाना मुद्दा फिर से गूंज रहा है-पिछले एक दशक में लगभग 1 लाख सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं, आलोचकों का कहना है कि यह सरकार द्वारा सार्वजनिक शिक्षा की उपेक्षा और...

जून 2026 में नीति आयोग की एक रिपोर्ट सामने आने के बाद से, सार्वजनिक बहस में एक जाना-पहचाना मुद्दा फिर से गूंज रहा है-पिछले एक दशक में लगभग 1 लाख सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं, आलोचकों का कहना है कि यह सरकार द्वारा सार्वजनिक शिक्षा की उपेक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एन.ई.पी.) के गरीबों के खिलाफ काम करने का सबूत है। यह संख्या वास्तविक है। 2014 में हमारे पास 11 लाख से कुछ अधिक स्कूल थे, जबकि अब हमारे पास 94,000 कम स्कूल हैं। लेकिन इससे निकाला जा रहा निष्कर्ष सही नहीं है। मैं यह बात सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का वर्षों तक अवलोकन करने और इन स्कूलों में सहकर्मियों के साथ प्रतिदिन काम करने के अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। हमने जमीनी स्तर पर जितने भी बंद देखे हैं, उनमें से लगभग सभी 2 श्रेणियों में से एक में आते हैं और दोनों को ही एक ही अनावश्यक रूप से चिंताजनक तरीके से देखा जा रहा है।

पहला मामला सीधा और आम है-2 छोटे सरकारी स्कूल एक-दूसरे से पैदल दूरी पर, एक ही बस्ती या आस-पास की बस्तियों में स्थित हैं और दोनों ही इतने छोटे हैं कि उनका संचालन ठीक से नहीं हो पाता। जब एक स्कूल बंद हो जाता है, तो उसके बच्चे और आमतौर पर शिक्षक दूसरे स्कूल में चले जाते हैं, जहां पहले की तरह ही बच्चे पढ़ते रहते हैं। विलय के बाद भी छात्रों के लिए स्कूल तक पहुंचने में कोई कठिनाई नहीं होती। दूसरा उदाहरण इसी बात का अधिक तकनीकी रूप है-दो पास-पास के स्कूलों को औपचारिक रूप से एक ही प्रबंधन इकाई के अधीन मिला दिया जाता है। गिनती में इसे ‘बंद’ के रूप में दिखाया जाता है, जबकि वास्तव में जमीनी स्तर पर कुछ भी बंद नहीं हुआ होता।

नीति आयोग की अपनी रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकता है कि राज्यों ने ऐसा क्यों किया। समान नामांकन संख्या के लिए भारत में चीन की तुलना में लगभग 5 गुना अधिक स्कूल हैं। हमारे 36 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं। एक छोटे स्कूल में भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों के लिए भी विषयवार शिक्षक नहीं हो सकते, कला और शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों की तो बात ही छोड़ दें। इसके भौतिक संसाधन भी सीमित हैं। ऐसे स्कूलों में शिक्षकों को अकेले काम करना पड़ता है और छात्रों को एक महत्वपूर्ण सीखने का अनुभव नहीं मिल पाता-कई सहपाठियों के साथ मिलकर काम करने का अनुभव। स्कूलों का एकीकरण सार्वजनिक प्रणाली की उपेक्षा नहीं, बल्कि यह एक सुधार है।

एक ऐसे शिक्षक का उदाहरण लीजिए जो पहले अकेले एक छोटे स्कूल का संचालन करते थे-5 कक्षाओं और 3 विषयों में फैले 25 बच्चे, जिन्हें वे दिन भर सभी को पढ़ाते थे और काम का बोझ बांटने वाला कोई नहीं था। स्कूलों के एकीकरण के बाद, वही शिक्षक पांचों कक्षाओं में फैले 50 छात्रों वाले स्कूल में 2 या 3 शिक्षकों में से एक हो सकते हैं-अधिक बच्चे अपने सहपाठियों के साथ सीखते हैं और काम का बंटवारा भी समझदारी से किया गया है-एक शिक्षक सभी कक्षाओं में भाषाएं पढ़ाता है, दूसरा गणित और विज्ञान तथा तीसरा सबसे छोटी कक्षाओं के बच्चों को। यही वह परिणाम है जो एन.ई.पी. में विषय-आधारित शिक्षण और बहु-कक्षाओं के बोझ को कम करने पर जोर देने का उद्देश्य है। तीन शिक्षकों का एक-एक विषय को अच्छी तरह से संभालना, एक शिक्षक द्वारा 3 विषयों को खराब तरीके से संभालने से कहीं बेहतर है।

हमने जितने भी उदाहरण देखे हैं, उनमें से अधिकांश में जो हो रहा है, वह एक धीमी और लंबे समय से अपेक्षित सुधार है-कम संख्या में, बेहतर कर्मचारियों और अधिक संसाधनों वाले स्कूल, कई छोटे, सीमित संसाधनों वाले और एकल-शक्षक स्कूलों की जगह ले रहे हैं। इसे सरकार की उदासीनता के प्रमाण के रूप में देखा जाना, शिक्षा में हो रही वास्तविक स्थिति की बजाय लोगों की पूर्वधारणाओं को अधिक दर्शाता है। किसी भी प्रकार के विद्यालय प्रणाली सुधार की कसौटी सरल है-क्या प्रत्येक बच्चा बिना किसी कठिनाई के एक सुचारू विद्यालय में प्रवेश कर सकता है और क्या वहां प्राप्त शिक्षा पहले से बेहतर है? दोनों ही मामलों में, जमीनी स्तर के साक्ष्य आश्वस्त करने वाले हैं। ये साक्ष्य आलोचकों द्वारा प्रचारित ‘94,000’ के आंकड़े के समान ही महत्वपूर्ण हैं।-अनुराग बेहार

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