पाकिस्तान के इस्लामी चरित्र की सच्चाई

Edited By Updated: 12 Feb, 2026 05:09 AM

the truth about pakistan s islamic character

6 फरवरी, 2026 को इस्लामाबाद की खादिजा-तुल-कुबरा शिया मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान आत्मघाती विस्फोट हुआ। इसमें 36 लोगों की जान चली गई और 160 से अधिक घायल हो गए। यह केवल एक आतंकी घटना नहीं थी। यह उस गंभीर बीमारी का लक्षण है, जो लंबे समय से...

6 फरवरी, 2026 को इस्लामाबाद की खादिजा-तुल-कुबरा शिया मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान आत्मघाती विस्फोट हुआ। इसमें 36 लोगों की जान चली गई और 160 से अधिक घायल हो गए। यह केवल एक आतंकी घटना नहीं थी। यह उस गंभीर बीमारी का लक्षण है, जो लंबे समय से पाकिस्तान और मजहब आधारित विचारधारा के भीतर पल रही है, जिसमें गैर-मुस्लिमों के साथ मुसलमान भी मुसलमानों के निशाने पर हैं। यह सिलसिला नया नहीं है। नवम्बर, 2024 में पराचिनार में शिया जुलूस पर हमला हुआ, जिसमें 44 लोग मारे गए। यह जुलूस पैगंबर मोहम्मद साहब की बेटी हजरत फातिमा की याद में निकाला जा रहा था। मार्च, 2022 में पेशावर की कुचा रिसालदार शिया मस्जिद में विस्फोट हुआ, 60 से अधिक लोग मारे गए। 2015 में शिकारपुर की शिया मस्जिद पर हुए हमले में जुमे की नमाज पढ़ रहे 61 लोगों की मौत हुई। 2013 में क्वेटा दो बड़े धमाकों से दहला था, जिसमें 200 से अधिक (अधिकांश शिया) मारे गए थे। ऐसी हृदयविदारक घटनाओं की एक लंबी सूची है।

पाकिस्तान में लगभग 4 करोड़ शिया बसते हैं। पिछले दो दशकों में 4,000 से अधिक शिया मुसलमान इस्लाम के नाम पर जिहादी हमलों में मारे जा चुके हैं। यह दर्दनाक मौतें प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि उस जहरीली सोच का स्वाभाविक नतीजा है, जिसका आधार ही असहिष्णुता और घृणा हैं। हर बड़ी आतंकी घटना के बाद पाकिस्तान की सत्ता का एक परिचित तरीका सामने आता है-दोष बाहर ढूंढो। इस्लामाबाद की शिया मस्जिद पर हालिया जिहादी हमले के बाद भी बिना ठोस प्रमाण के भारत और अफगानिस्तान पर आरोप मढ़े गए। लेकिन यह समस्या आयातित नहीं है। वास्तव में, यह ङ्क्षहसा उस वैचारिक अधिष्ठान से प्रेरित है, जिसकी नींव से पाकिस्तान नाम के कृत्रिम देश का जन्म हुआ और उसी से खुराक लेकर एक राष्ट्र के रूप में जीवित रहने की कोशिश कर रहा है। ‘तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान’ और ‘अहल-ए-सुन्नत-वॉल-जमात’ जैसे समूह खुले मंचों से शिया विरोधी भाषण देते रहे हैं। सितम्बर, 2020 में कराची में हजारों सुन्नी कट्टरपंथियों ने रैली निकाली थी, जिसमें शिया मुसलमानों के खिलाफ नारे लगाते हुए उन्हें ‘ईशनिंदक’ बताकर उनका गला काटने की मांग की गई थी। ऐसे खुलेआम प्रदर्शन इस्लामाबाद सहित पाकिस्तान के अलग-अलग में हिस्सों में हुए थे। पाकिस्तानी सत्ता अधिष्ठान ने वैचारिक बाध्यता के अनुरूप जिहादियों से सीधे संघर्ष की बजाय उनसे बचने या उनका प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग करने का रास्ता चुना। 

2020 में पाकिस्तानी पंजाब में पारित ‘तहफ्फुज-ए-बुनियाद-ए-इस्लाम कानून’ इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जिसमें इस्लामी मामले में केवल सुन्नी दृष्टिकोण को एकमात्र सच्चा और दूसरे मुस्लिम विचार (शिया सहित) ईशनिंदा के समकक्ष हैं। इस चिंतन का एक वीभत्स रूप 2022 में तब सामने आया, जब डेरा इस्माइल खान में 3 महिला शिक्षकों ने ईशनिंदा के आरोप में अपनी ही एक सहयोगी शिक्षिका की गला रेतकर हत्या सिर्फ इसलिए कर दी, क्योंकि उन्हें एक छात्रा ने बताया था कि उसने सपने में शिक्षिका (मृत) को ईशङ्क्षनदा करते देखा था।
आखिर पाकिस्तान में ऐसा क्यों हो रहा है? इसका जवाब उस चिंतन में है, जिसमें आतंकवादियों को ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ में वर्गीकृत किया जाता है। जब जिहादी भारत या इसराईल को निशाना बनाते हैं, तो वे पाकिस्तान में ‘नायक’ कहलाते हैं। लेकिन जब वही आतंकी अपनों को ही डंसने लगते हैं, तो पाकिस्तान स्वयं को ‘आतंकवाद का पीड़ित’ बताने लगता है। क्या यह सच नहीं कि दोनों मामलों में हमलावर एक ही विषाक्त मानसिकता से प्रेरणा पाते हैं?

पाकिस्तान का अक्सर तर्क रहा है कि भारत ‘मुसलमानों के लिए सुरक्षित नहीं है।’ सच्चाई इस झूठ से कोसों दूर है। 1947 में भारत में लगभग 3 करोड़ मुसलमान थे, आज उनकी संख्या 22-24 करोड़ के बीच है। वे लोकतंत्र में भाग लेते हैं, चुनाव लड़ते हैं और शासन-प्रशासन, सेना, शिक्षा और व्यापार में उनकी मौजूदगी है। बहुसंख्यकों की तरह उन्हें समान और कई मामले में अधिक संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। भारत के खाड़ी देशों (अधिकांश इस्लामी) से मजबूत संबंध हैं। मोदी सरकार में ये रिश्ते और प्रगाढ़ हुए हैं। इसके उलट, पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों की संख्या लगातार घटी है। उनकी महिलाएं मजहबी यातनाओं की शिकार हैं। ङ्क्षहदू, सिख आदि अल्पसंख्यक सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब हैं। अहमदिया संवैधानिक रूप से गैर-मुस्लिम घोषित हैं।

यह अंतर केवल नीतियों का नहीं, वैचारिक दृष्टिकोण का भी है।
पाकिस्तान में पहचान का संकट भी उसकी समस्या के केंद्र में है। उसका सत्ता-वैचारिक अधिष्ठान अपनी प्राचीन और बहुलतावादी सनातन विरासत से दूरी बनाता है। जब समाज अपनी सांस्कृतिक निरंतरता की बजाय अपनी जड़ों को अस्वीकार करता है, तो वह भ्रम और कुंठा से घिर जाता है। एक ओर पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर गांधार बौद्ध विरासत को अपनी ऐतिहासिक धरोहर मानता है, साथ ही उन इस्लामी आक्रांताओं- गजनवी, गोरी, बाबर, औरंगजेब, अब्दाली, टीपू सुल्तान आदि को भी अपना नायक कहता है, जिन्होंने मजहबी जुनून में इन्हीं सनातन प्रतीकों को रौंदा था। दुनियाभर के मुसलमानों (भारत सहित) के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत है जिसे अक्सर इस्लामी पहचान का प्रतीक माना जाता है, वह पाकिस्तान अपने जन्म से ही औपनिवेशिक शक्तियों का प्यादा है, जिसका मैं इसी कॉलम में तथ्यों-तर्कों के साथ उल्लेख कर चुका हूं।

क्या मस्जिद में नमाज पढ़ते मुस्लिमों की मजहब के नाम पर सहबंधुओं द्वारा हत्या जायज ठहराई जा सकती है? यह केवल कानून और सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि वैचारिक ङ्क्षचतन का भी प्रश्न है। जब नफरत सामान्य हो जाए, तो हिंसा असामान्य नहीं रह जाती। जम्मू.कश्मीर में कुछ शिया प्रदर्शनकारियों ने यही सवाल उठाया है- ‘मस्जिदों में नमाज पढ़ते मुसलमानों को मारना कैसा जिहाद है?’ किसी भी राष्ट्र की स्थिरता उसकी विविधता को संभालने की क्षमता पर निर्भर करती है। सह-अस्तित्व, कानून का समान संरक्षण, अपनी जड़ों (पहचान सहित) का सम्मान और नफरत के खिलाफ स्पष्ट रुख, ये किसी भी आधुनिक और शांतिप्रिय देश की मौलिक शर्तें हैं। क्या पाकिस्तान इनमें से किसी पर भी खरा उतरता है?-बलबीर पुंज
श्च

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