ट्रम्प का वेनेजुएला कांड, भारत के लिए सबक

Edited By Updated: 08 Jan, 2026 04:22 AM

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भारत और वेनेजुएला एक-दूसरे से बहुत अलग देश हैं। दोनों के बीच भौगोलिक दूरी लगभग 14,250 किलोमीटर है। काराकस, दक्षिण अमरीका की कभी जीवंत मानी जाने वाली राजधानी, आज वैश्विक घटनाक्रम के केंद्र में है। वहां जो कुछ अचानक और चौंकाने वाला हुआ, वह केवल...

भारत और वेनेजुएला एक-दूसरे से बहुत अलग देश हैं। दोनों के बीच भौगोलिक दूरी लगभग 14,250 किलोमीटर है। काराकस, दक्षिण अमरीका की कभी जीवंत मानी जाने वाली राजधानी, आज वैश्विक घटनाक्रम के केंद्र में है। वहां जो कुछ अचानक और चौंकाने वाला हुआ, वह केवल वेनेजुएला की कहानी नहीं, बल्कि उसमें भारत और शेष विश्व के लिए गंभीर सबक छिपे हुए हैं।

पहला सबक- ‘लोकतंत्र’, ‘मानवाधिकार’, ‘अंतरराष्ट्रीय कानून’ और ‘सुशासन’ जैसे चमकदार शब्द वैश्विक राजनीति में अक्सर खोखले साबित होते हैं। व्यवहार में असहजता और कड़वी सच्चाई को ढकने का औजार बन जाते हैं। भ्रष्ट और स्वार्थी नेतृत्व इन्हीं आदर्शवादी नारों की आड़ में अपनी विफलताओं को छिपाता है। बाद में नव-औपनिवेशिक ताकतें इन्हें हथियार की तरह इस्तेमाल करके अपने विस्तारवादी आॢथक और राजनीतिक हितों को साधने का उपक्रम बनाती हैं। वेनेजुएला पर अमरीका का औचक सैन्य हमला उसी शाश्वत सिद्धांत को पुनस्र्थापित करता है, जो सदियों से वैश्विक राजनीति को संचालित करता आया है-‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’। दूसरा-गरीबी मिटाने और समृद्धि लाने का कोई लघु-मार्ग नहीं होता। इसके लिए प्रतिस्पर्धा, कठोर परिश्रम और उत्पादन-आधारित अर्थव्यवस्था अनिवार्य है।

जो नीतियां संपत्ति सृजन करने की बजाय केवल संपत्ति के पुनॢवतरण को प्राथमिकता दें, वे अंतत: देशों को आर्थिक तबाही और राजनीतिक पराधीनता की ओर ले जाती हैं। उत्पादन की उपेक्षा करके केवल पुनॢवतरण करना इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि वह वास्तविक लोकतंत्र को धीरे-धीरे, कानूनी रास्तों से, आॢथक अराजकता की ओर धकेल देता है। जब असमानता को जटिल सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं का परिणाम मानने की बजाय केवल ‘लूट’ और ‘भ्रष्टाचार’ का प्रमाण बताया जाने लगता है, तो धन कमाना ही नैतिक अपराध बना दिया जाता है। 
तीसरा सबक इतिहास से जुड़ा है। 20वीं सदी की शुरुआत में यह माना गया कि दुनिया अब बर्बर युद्ध से ऊपर उठ चुकी है। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने इस भ्रम को तोड़ दिया। तब वैश्विक शांति के लिए ‘राष्ट्र संघ’ (1920-46) बना, जो पहले से अधिक विनाशकारी दूसरे

विश्व युद्ध (1939-45) को नहीं रोक पाया। तब इस उम्मीद के साथ 1945 में ‘संयुक्त राष्ट्र’ की स्थापना हुई कि भविष्य में कोई युद्ध नहीं होगा। लेकिन क्या यह उद्देश्य पूरा हुआ? विभिन्न संघर्ष और दशकों से हजारों जिहादी हमले-ये सभी संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता और ‘शक्ति’ पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। चौथा सबक-सभी देशों में ऐसे नेता होते हैं, जो सत्ता की अंधी दौड़ में जनता को असंभव सपने दिखाते हैं और उनकी भावनाओं से खेलकर सत्ता में आ जाते हैं। कुर्सी मिलने के बाद वे अव्यवहारिक वादे पूरे नहीं कर पाते, जिससे धीरे-धीरे या अचानक, निर्दयी तानाशाह में बदल जाते हैं। वेनेजुएला ऐसे ही नेताओं का शिकार रहा है, जिनकी सनकी नीतियों ने देश को बर्बाद कर दिया। स्वतंत्रता के बाद भारत भी एक समय इसका शिकार रहा था। 1969 में कांग्रेस के विभाजन पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनाव में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया, पूरे विपक्ष को ‘पूंजीपतियों का एजैंट’ बताकर भारी बहुमत से जीत हासिल की। 

उनकी नीतियां उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की बजाय पुनर्वितरणऔर राष्ट्रीयकरण पर केंद्रित रहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि कालांतर में दूध, वनस्पति घी, गेहूं, चावल जैसी आवश्यक वस्तुओं की भारी किल्लत हो गई और कालाबाजारी बढ़ गई। उसी आॢथक अव्यवस्था ने व्यापक जन-असंतोष को जन्म दिया। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिराजी का चुनाव रद्द कर दिया। इस पर उन्होंने देश पर आपातकाल थोप दिया, जो मार्च 1977 तक जारी रहा। लातिन अमरीकी देश वेनेजुएला का पतन न तो प्रतिबंधों से शुरू हुआ और न ही ट्रम्प की सनक से। इसकी जड़ें उस आकर्षक, लेकिन घातक विचार में मिलती हैं, जिसमें मान्यता थी कि केवल पुनॢवतरण ही उत्पादन का विकल्प हो सकता है। 1999-2013 तक वेनेजुएला के राष्ट्रपति रहे ह्यूगो शावेज ने खुद को ‘मसीहा’ के रूप में पेश किया। उनका तर्क था कि तेल से होने वाली आय सिर्फ ‘जनता’ की है, न कि निजी कंपनियों या वैश्विक रणनीतिक सांझेदारों की। देखते ही देखते हजार से अधिक निजी कंपनियां जब्त कर ली गईं। अत्यधिक मुद्राएं छापी गईं, जिससे बेतहाशा महंगाई बढ़ी। पूर्ति गई और भुखमरी बढ़ गई।

पिछले कुछ समय से कांग्रेस के शीर्ष नेता और वर्तमान लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी पुनॢवतरण की मांग को भारत में तेज कर रहे हैं, जिसमें अक्सर ‘जितनी आबादी, उतना हक’ नामक जुमला छोड़ा जाता है। सफल देश विभिन्न योजनाओं से मुनाफे का पुनॢवतरण करते हैं। इंदिराजी और चावेज ने पुनॢवतरण के नाम पर आय के स्रोत को नष्ट कर दिया था। राहुल भी सत्ता के लिए इसे दोहराना चाहते हैं। इस पृष्ठभूमि में वेनेजुएला एक चेतावनी है। जो देश लोकलुभावन वादों और पहचान-आधारित पुनॢवतरण के जाल में फंसते हैं, वे अंतत: पतन के रास्ते पर चल पड़ते हैं।-बलबीर पुंज

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