भारत-अमरीका व्यापार समझौते में इतना समय क्यों लग रहा है?

Edited By Updated: 10 Jan, 2026 05:38 AM

why is the india us trade agreement taking so long

व्यापार नीति नहीं, बल्कि सुरक्षा पर निर्भरता, वाशिंगटन की अन्य देशों के साथ इतनी तेजी से व्यवहार करने की वजह है और यही कारण है कि भारत अपनी स्थिति पर अड़ा हुआ है। भारत ने अभी तक अमरीका (यू.एस.) के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता क्यों नहीं किया, जबकि...

व्यापार नीति नहीं, बल्कि सुरक्षा पर निर्भरता, वाशिंगटन की अन्य देशों के साथ इतनी तेजी से व्यवहार करने की वजह है और यही कारण है कि भारत अपनी स्थिति पर अड़ा हुआ है। भारत ने अभी तक अमरीका (यू.एस.) के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता क्यों नहीं किया, जबकि दोनों देशों ने अन्य सांझेदारों के साथ तेजी से समझौते किए हैं? पिछले 4 वर्षों में ही भारत ने मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ओमान, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ ब्लॉक, यूनाइटेड किंगडम (यू.के.) और इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (आई.पी.ई.एफ.) के सदस्यों के साथ व्यापार समझौते संपन्न किए हैं, जिसमें अमरीका भी शामिल है। पिछले 6 महीनों में वाशिंगटन ने जापान, यूरोपीय संघ (ई.यू.), ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, वियतनाम और मलेशिया के साथ त्वरित व्यापार समझौते किए हैं। तो फिर भारत-अमरीका समझौते में इतना समय क्यों लग रहा है?

इसके दो मुख्य कारण हैं- पहला, अमरीका के साथ तेजी से व्यापार समझौते करने वाले अधिकांश देश अपनी सुरक्षा के लिए वाशिंगटन पर काफी हद तक निर्भर हैं। जबकि भारत के साथ ऐसा नहीं है। दूसरा, अमरीका-भारत व्यापार वात्र्ता व्यापार से कहीं आगे बढ़कर वाशिंगटन के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक और नीतिगत क्षेत्रों तक फैली हुई है। ये दो कारक बातचीत को जटिल बनाते हैं और यही कारण है कि समझौता होने में उम्मीद से अधिक समय लग रहा है। उदाहरण के लिए, जापान और दक्षिण कोरिया अमरीका के औपचारिक संधि सहयोगी हैं और बड़ी संख्या में अमरीकी सैनिकों की मेजबानी करते हैं, विशेष रूप से उत्तर कोरिया और चीन से उत्पन्न खतरों को देखते हुए। यूरोप में भी यही पैटर्न देखने को मिलता है। उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के माध्यम से ब्रिटेन अमरीका के सबसे करीबी रणनीतिक सांझेदारों में से एक बना हुआ है। ऐसे मामलों में, व्यापार वार्ताएं रणनीतिक गठबंधन से प्रभावित होने के कारण, अमरीकी मांगों के प्रति प्रतिरोध सीमित रहता है।

दक्षिणपूर्व एशिया में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिलती है। पारस्परिक रक्षा संधि से बंधे फिलीपींस ने हाल के वर्षों में अमरीकी सैन्य पहुंच का विस्तार किया है। संधि के तहत सहयोगी देश थाईलैंड भी अमरीकी सुरक्षा ढांचे में गहराई से जुड़ा हुआ है। इन देशों के लिए व्यापार समझौते सुरक्षा निर्भरता पर आधारित एक व्यापक भू-राजनीतिक सौदे का हिस्सा हैं। भारत की स्थिति अलग है। यह अपनी सुरक्षा के लिए अमरीका पर निर्भर नहीं है और सैन्य दबाव के माध्यम से इस पर दबाव नहीं डाला जा सकता। यह रणनीतिक स्वायत्तता व्यापार वात्र्ताओं के स्वरूप को मौलिक रूप से बदल देती है। अमरीका-भारत व्यापार समझौते के लिए फरवरी 2025 में बातचीत शुरू हुई थी लेकिन वाशिंगटन भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह विनियमन और प्रौद्योगिकी से लेकर ऊर्जा और भू-राजनीति तक के क्षेत्रों में अमरीकी हितों के अनुरूप प्रमुख घरेलू नीतियों को फिर से आकार दे। अमरीका चाहता है कि भारत अमरीकी तेल और रक्षा उपकरण अधिक खरीदे, डाटा और डिजिटल नियमों में ढील दे और ब्रिक्स सांझेदारों, विशेष रूप से रूस और चीन से दूरी बनाए रखे।

इस बीच, भारत ने पहले ही महत्वपूर्ण रियायतें दी हैं। पिछले एक वर्ष में, अमरीका से इसके तेल आयात में लगभग 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसने अपने परमाणु दायित्व ढांचे के कुछ पहलुओं को समायोजित किया है और स्टारलिंक को परिचालन शुरू करने की अनुमति दी है, हालांकि यह चिंता बनी हुई है कि अप्रतिबंधित उपग्रह पहुंच संवेदनशील क्षेत्रों में संप्रभु नियंत्रण को कमजोर कर सकती है। भारत ने डिजिटल लेन-देन कर भी हटा दिया है। फिर भी, वाशिंगटन डेयरी उत्पादों और मक्का और सोयाबीन सहित अनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के लिए अप्रतिबंधित पहुंच पर जोर दे रहा है, जो पर्यावरण, राजनीतिक और सामाजिक चिंताओं के कारण भारत में एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है।

हालांकि दोनों पक्ष चुप हैं और कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई, ऐसा प्रतीत होता है कि वार्ताकार समझौते की सीमा तक पहुंच चुके हैं और अब यह समझौता राष्ट्रपति ट्रम्प के फैसले का इंतजार कर रहा है। देरी का उद्देश्य भारत से और अधिक रियायतें हासिल करना हो सकता है। हालांकि, भारत को रूसी कच्चे तेल पर स्पष्ट निर्णय लेना होगा। भारतीय रिफाइनरियों ने खरीद कम करने का इरादा जताया है लेकिन रूसी तेल का प्रवाह जारी है, जो नवम्बर में भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 35 प्रतिशत यानी 72 मिलियन टन था। पिछले 6 महीनों में अमरीका को निर्यात में 20.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। स्पष्ट रूप से वाशिंगटन भारत की स्थिति को और जटिल बना रहा है, रूसी तेल आपूॢत में कटौती से अमरीकी दबाव के समाप्त होने की कोई गारंटी न होना। व्यापार समझौता तभी सार्थक होता है जब वह निष्पक्ष और पारस्परिक हो। यदि इसकी कीमत रणनीतिक निर्भरता या नीतिगत स्वतंत्रता का नुकसान है, तो प्रतीक्षा करना ही समझदारी भरा विकल्प है।-अजय श्रीवास्तव

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