हरित इस्पात अनिवार्य करने से 2030 तक 1.6 करोड़ टन मांग संभव, कार्बन उत्सर्जन में आएगी कमी

Edited By Updated: 27 Feb, 2026 06:00 PM

mandating green steel could increase demand by 16 million tons by 2030

सरकारी परियोजनाओं में हरित इस्पात का इस्तेमाल 26 प्रतिशत तक अनिवार्य करने से 2030 तक 1.6 करोड़ टन तक ग्रीन स्टील की मांग बढ़ सकती है। इससे एक तरफ जहां कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी, वहीं दूसरी तरफ घरेलू उद्योग की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ेगी।...

नई दिल्लीः सरकारी परियोजनाओं में हरित इस्पात का इस्तेमाल 26 प्रतिशत तक अनिवार्य करने से 2030 तक 1.6 करोड़ टन तक ग्रीन स्टील की मांग बढ़ सकती है। इससे एक तरफ जहां कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी, वहीं दूसरी तरफ घरेलू उद्योग की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ेगी। उद्योग मंडल भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की एक रिपोर्ट में यह कहा गया। सीआईआई-ग्रीन बिजनेस सेंटर द्वारा विकसित और क्लाइमेट कैटालिस्ट द्वारा समर्थित उद्योग तत्परता आकलन रिपोर्ट में पाया गया है कि हरित इस्पात को अनिवार्य किये जाने पर देश हरित इस्पात की सार्वजनिक खरीद (जीपीपी) व्यवस्था को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस कदम से वित्त वर्ष 2027-28 से प्रमाणित निम्न-कार्बन इस्पात के लिए देश का पहला बड़े पैमाने पर, सुनिश्चित बाजार बनाने में मदद मिल सकती है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक खरीद पर प्रतिवर्ष लगभग 45 से 50 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं और सरकारी परियोजनाओं में लगभग 3.16 करोड़ टन स्टील की खपत होती है। इससे वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग सात करोड़ टन कार्बन (सीओ2) उत्सर्जन हुआ। अध्ययन के अनुसार, यदि केवल 26 प्रतिशत का मामूली अनिवार्य लक्ष्य भी तय किया जाए तो वित्त वर्ष 2029-30 तक प्राथमिक और द्वितीयक इस्पात उत्पादकों से 1.6 करोड़ टन प्रमाणित ग्रीन स्टील की मांग उत्पन्न हो सकती है। इससे देश में उद्योगों में कार्बन उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने में मदद मिलेगी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता भी मजबूत होगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर यह लक्ष्य और बढ़ाकर 37 प्रतिशत रखा जाए तो मांग 2.4 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। इससे 2030 तक 2.97 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। 

सीआईआई के कार्यकारी निदेशक और ग्लोबल इकोलेबलिंग नेटवर्क बोर्ड के चेयरमैन के.एस. वेंकटगिरी ने कहा, "हरित सार्वजनिक खरीद नीति से भारत के इस्पात उद्योग को कम-कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पादन की ओर ले जाने में मदद मिलेगी। इससे पर्यावरण को स्वच्छ रखने में मदद मिलेगी, बाजार में हरित इस्पात को बढ़ावा मिलेगा और नई प्रौद्योगिकियों में निवेश बढ़ेगा।" उन्होंने कहा, "यह नीति इस्पात उद्योग की प्रतिस्पर्धा भी मजबूत करेगी और भारत के जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप है।" क्लाइमेट कैटलिस्ट की निदेशक साक्षी बलानी ने कहा, "यह अध्ययन एक बात बिल्कुल साफ कर देता है कि अगर सरकार हरित इस्पात के इस्तेमाल का एक स्पष्ट नियम बना दे, तो देश का इस्पात क्षेत्र किसी भी सरकारी सब्सिडी या नई प्रौद्योगिकी से कहीं ज्यादा तेजी से बदल सकता है। 'जीपीपी' (हरित इस्पात की सार्वजनिक खरीद) वह जरूरी संकेत है जिससे तुरंत प्रदूषण (उत्सर्जन) कम हो सकता है और बड़े पैमाने पर निवेश के रास्ते खुल सकते हैं।"  

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