Masan Holi 2026: कल काशी में खेली जाएगी चिता की भस्म से होली, जानें मसान होली की ऐतिहासिक परंपरा

Edited By Updated: 27 Feb, 2026 10:03 AM

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Masan Holi 2026: देशभर में होली रंग, अबीर और गुलाल के साथ उत्साहपूर्वक मनाई जाती है, लेकिन उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक नगरी वाराणसी (काशी) में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां चिता की भस्म से होली खेली जाती है, जिसे ‘मसान होली’ के नाम से जाना जाता...

Masan Holi 2026: देशभर में होली रंग, अबीर और गुलाल के साथ उत्साहपूर्वक मनाई जाती है, लेकिन उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक नगरी वाराणसी (काशी) में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां चिता की भस्म से होली खेली जाती है, जिसे ‘मसान होली’ के नाम से जाना जाता है। यह अद्भुत आयोजन दुनिया भर में प्रसिद्ध है और इसे देखने देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। साल 2026 में जहां 4 मार्च को देशभर में धुलंडी मनाई जाएगी, वहीं काशी में उससे पहले मसान होली का आयोजन होगा।

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मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है मसान होली
काशी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर सदियों पुरानी परंपरा के तहत चिता की राख से होली खेली जाती है। यह आयोजन आमतौर पर रंगभरी एकादशी के अगले दिन होता है। साल 2026 में आमलकी (रंगभरी) एकादशी 27 फरवरी को पड़ रही है। इसके अगले दिन, 28 फरवरी 2026 को मसान होली मनाई जाएगी। इस दौरान श्मशान घाट पर साधु-संत, नागा और अघोरी एकत्र होकर भस्म से होली खेलते हैं।श्मशान का नाम जहां आम लोगों के मन में भय उत्पन्न करता है, वहीं काशी में इसे मोक्ष का द्वार माना जाता है। यहां मृत्यु को उत्सव के रूप में देखने की परंपरा है।

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कैसे शुरू हुई चिता की भस्म से होली?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत स्वयं शिव ने की थी। कथाओं के अनुसार, विवाह के बाद जब भगवान शिव पहली बार काशी आए, तो नगरवासियों ने उत्सव मनाया और होली खेली। इस अवसर पर देवी-देवता उपस्थित थे, लेकिन शिव के प्रिय गण भूत, प्रेत, यक्ष और गंधर्व इस उत्सव से वंचित रह गए। बताया जाता है कि फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भगवान शिव ने मणिकर्णिका घाट के श्मशान में अपने गणों के साथ भस्म की होली खेली। इसी घटना को मसान होली की शुरुआत माना जाता है।धार्मिक ग्रंथों जैसे शिव पुराण और दुर्गा सप्तशती में भी शिव और उनके गणों के इस अनोखे स्वरूप का उल्लेख मिलता है।

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आध्यात्मिक संदेश: मृत्यु नहीं, नई शुरुआत
काशी में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग माना जाता है। मसान होली इस विचार को सजीव करती है कि जीवन और मृत्यु एक ही चक्र के दो पहलू हैं।

श्मशान की राख से होली खेलना यह संदेश देता है कि मृत्यु भय का विषय नहीं, बल्कि आत्मा की नई यात्रा की शुरुआत है। शिव के लिए जीवन का उल्लास और मृत्यु की शांति दोनों समान हैं।

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ऐसे खेली जाती है मसान होली
मसान होली में मुख्य रूप से नागा साधु, अघोरी और अन्य साधु-संत भाग लेते हैं। आयोजन से पहले बाबा महाश्मशान नाथ और माता मसान काली की आरती की जाती है।

इसके बाद जलती चिताओं के बीच भस्म से होली खेली जाती है। साधु गले में नरमुंड धारण कर, भूत-पिशाचों की वेशभूषा में डमरू और नगाड़ों की धुन पर नृत्य करते हैं। राख को रंगों की तरह एक-दूसरे पर लगाया और हवा में उड़ाया जाता है।

यह दृश्य अद्भुत और आध्यात्मिक अनुभूति से भरपूर माना जाता है।

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क्या आम लोग भी खेल सकते हैं मसान होली?
परंपरागत रूप से मसान होली साधु-संतों द्वारा ही खेली जाती है। हालांकि, समय के साथ कुछ शिवभक्त भी इसमें शामिल होने लगे हैं।

जलती चिताओं के बीच भस्म से होली खेलना सामान्य लोगों के लिए सहज नहीं माना जाता। अधिकांश श्रद्धालु दूर से ही इस अनोखे उत्सव का दर्शन करते हैं। परंपरा के अनुसार, महिलाओं की भागीदारी इस आयोजन में नहीं होती।

मसान होली केवल एक अनोखी परंपरा नहीं, बल्कि काशी की आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। यह उत्सव जीवन, मृत्यु और मोक्ष के गूढ़ संबंध को दर्शाता है। काशी की यह भस्म होली दुनिया को यह संदेश देती है कि जहां आस्था है, वहां भय नहीं और जहां शिव हैं, वहां जीवन और मृत्यु दोनों ही उत्सव हैं।

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