Edited By jyoti choudhary,Updated: 03 Oct, 2026 03:27 PM

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि भारत क्रिप्टोकरेंसी को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए है लेकिन इससे जुड़ी नई तकनीकों और उनके संभावित उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने साथ ही कहा कि वित्तीय प्रणाली की मौजूदा
नई दिल्लीः भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि भारत क्रिप्टोकरेंसी को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए है लेकिन इससे जुड़ी नई तकनीकों और उनके संभावित उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने साथ ही कहा कि वित्तीय प्रणाली की मौजूदा मजबूती को भविष्य के जोखिमों से सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता और नए तरह के खतरों से निपटने के लिए लगातार सतर्कता जरूरी है।
कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए मल्होत्रा ने कहा कि भारत क्रिप्टो परिसंपत्तियों से जुड़ी डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (DLT) और टोकन व्यवस्था जैसी तकनीकों में नवाचार का समर्थन करता है। आरबीआई इन तकनीकों का इस्तेमाल केंद्रीय बैंक के भीतर तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से भी कर रहा है। हालांकि, मौद्रिक संप्रभुता, मौद्रिक नीति और पूंजी प्रवाह से जुड़ी चिंताओं के कारण क्रिप्टोकरेंसी के प्रति सतर्कता बरती जा रही है।
उन्होंने कहा कि क्रिप्टो से जुड़ी प्रमुख चिंताओं में मुद्रा की एकरूपता और मौद्रिक नीति पर संभावित प्रभाव शामिल हैं। खासकर उन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह महत्वपूर्ण है, जहां पूंजी प्रवाह पर कुछ प्रतिबंध लागू हैं। मल्होत्रा ने कहा कि घरेलू भुगतान के क्षेत्र में भारत ने काफी प्रगति की है और अब अधिक महत्वपूर्ण चुनौती सीमा-पार भुगतान की है। इसके लिए केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सी.बी.डी.टी.) सहित दूसरे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
'आज की मजबूती कल की सुरक्षा की गारंटी नहीं'
आरबीआई गवर्नर ने वित्तीय स्थिरता पर जोर देते हुए कहा कि वित्तीय प्रणाली को केवल झटकों को रोकने के बजाय उनके असर को सहने और सीमित करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एन.बी.एफ.सी.) के मजबूत बही-खातों से वित्तीय प्रणाली मजबूत बनी हुई है, लेकिन आज की मजबूती को कल की सुरक्षा नहीं माना जा सकता।
मल्होत्रा ने कहा कि अगला वित्तीय संकट जरूरी नहीं कि किसी बैंक या वित्तीय क्षेत्र के भीतर से ही शुरू हो। वैश्विक घटनाएं, साइबर हमले या तकनीकी विफलताएं भी वित्तीय प्रणाली में जोखिम पैदा कर सकती हैं और इनके प्रभाव कई माध्यमों से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने वित्तीय नेटवर्क की परस्पर निर्भरता और संकट के फैलने के रास्तों को बेहतर ढंग से समझने के लिए अधिक विस्तृत आंकड़ों और मजबूत निगरानी व्यवस्था की जरूरत बताई।
सिर्फ बैंकिंग प्रणाली की मजबूती पर्याप्त नहीं
मल्होत्रा ने कहा कि वित्तीय मजबूती पूरे तंत्र में होनी चाहिए। इसके लिए बैंकों के साथ एनबीएफसी, वित्तीय बाजारों, भुगतान प्रणालियों, प्रौद्योगिकी ढांचा प्रदाताओं, महत्वपूर्ण तीसरे पक्षों और सीमा-पार वित्तीय नेटवर्कों की भी निगरानी और मजबूती जरूरी है। उन्होंने वैश्विक सार्वजनिक ऋण और बॉण्ड पर बढ़ती प्रतिफल दरों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक सरकार और निजी क्षेत्र का खर्च बढ़ रहा है, जिसमें कृत्रिम मेधा (एआई) से जुड़ा निवेश भी शामिल है। सीमित उपलब्ध धन के बीच बढ़ता खर्च बॉण्ड प्रतिफल और ऋण की स्थिति को प्रभावित कर रहा है।
मल्होत्रा ने कहा कि आरबीआई की मौद्रिक नीति का मुख्य ध्यान घरेलू आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति पर रहता है, हालांकि वैश्विक ब्याज दरों का भारत की वास्तविक ब्याज दरों समेत अन्य आर्थिक परिस्थितियों पर भी असर पड़ता है।