Narasimha Dwadashi Vrat Katha 2026: नरसिंह द्वादशी की सम्पूर्ण कथा, प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की पौराणिक कहानी

Edited By Updated: 27 Feb, 2026 08:30 AM

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Narasimha Dwadashi Vrat Katha 2026: नरसिंह द्वादशी भगवान विष्णु के दिव्य अवतार नरसिंह को समर्पित पावन तिथि है। यह कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि अटूट भक्ति, सत्य और धर्म की विजय का संदेश देती है। आइए जानते हैं इस व्रत की पौराणिक कथा।

Narasimha Dwadashi Vrat Katha 2026: नरसिंह द्वादशी भगवान विष्णु के दिव्य अवतार नरसिंह को समर्पित पावन तिथि है। यह कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि अटूट भक्ति, सत्य और धर्म की विजय का संदेश देती है। आइए जानते हैं इस व्रत की पौराणिक कथा।

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हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा
प्राचीन समय में एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था हिरण्यकशिपु। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह न किसी मनुष्य से मरेगा, न पशु से, न दिन में, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर, न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से, न धरती पर, न आकाश में।

वरदान पाकर वह अत्याचारी बन गया और स्वयं को ही भगवान मानने लगा। उसने अपने राज्य में विष्णु भक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया
लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह हर समय "नारायण-नारायण" का जाप करता था। पिता ने उसे समझाया, धमकाया, लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे कई प्रकार की यातनाएं दीं।

भक्त की परीक्षा
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को ऊंचे पर्वत से गिरवाया, विष पिलाने की कोशिश की, हाथियों से कुचलवाने का प्रयास किया, अग्नि में बैठाया परंतु हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे।

भगवान नरसिंह का प्राकट्य
एक दिन क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा, "कहां है तेरा भगवान?"

प्रह्लाद ने शांत स्वर में कहा,  "भगवान सर्वत्र हैं।"

क्रोध में आकर हिरण्यकशिपु ने महल के एक स्तंभ पर प्रहार किया। उसी क्षण स्तंभ से भगवान विष्णु अपने उग्र रूप नरसिंह के रूप में प्रकट हुए। यह रूप अद्भुत था आधा मनुष्य, आधा सिंह।

वरदान का अंत
भगवान नरसिंह ने संध्या समय (न दिन, न रात), महल की चौखट पर (न अंदर, न बाहर), अपनी जंघा पर बैठाकर (न धरती, न आकाश), नखों से (न अस्त्र, न शस्त्र) हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान की प्रत्येक शर्त पूर्ण हुई और अधर्म का अंत हुआ।

भक्त प्रह्लाद का सम्मान
हिरण्यकशिपु के वध के बाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। तब बालक प्रह्लाद ने श्रद्धा से उनकी स्तुति की। अपने परम भक्त की प्रार्थना सुनकर भगवान शांत हुए और उसे आशीर्वाद दिया।

उन्होंने कहा, "जो भी इस दिन श्रद्धा से व्रत और पूजा करेगा, उसके सभी भय और संकट दूर होंगे।"

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व्रत कथा का संदेश
नरसिंह द्वादशी की यह कथा हमें सिखाती है सच्ची भक्ति में अपार शक्ति होती है। ईश्वर हर स्थान पर उपस्थित हैं। अधर्म चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो, अंत में धर्म की ही विजय होती है। भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

नरसिंह द्वादशी व्रत का फल
शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति नरसिंह द्वादशी का व्रत रखकर यह कथा श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है, उसे शत्रु भय से मुक्ति,
मानसिक शांति, साहस और आत्मबल, घर में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

समापन प्रार्थना
"हे प्रभु नरसिंह! जैसे आपने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की, वैसे ही हमारे जीवन के भय, संकट और बाधाओं का नाश करें और हमें धर्म मार्ग पर चलने की शक्ति दें।"

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