Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 : नंदा देवी राज जात के लिए सरकार ने दिए 25 करोड़, जानें क्यों यह यात्रा कहलाती है हिमालय का महाकुंभ ?

Edited By Updated: 12 Mar, 2026 10:15 AM

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Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 : हिमालय की गोद में बसी उत्तराखंड की देवभूमि अपनी प्राचीन परंपराओं और अटूट विश्वास के लिए विश्वविख्यात है। इन्हीं परंपराओं में सबसे ऊपर नाम आता है नंदा देवी राज जात का। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि एक बेटी...

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Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 : हिमालय की गोद में बसी उत्तराखंड की देवभूमि अपनी प्राचीन परंपराओं और अटूट विश्वास के लिए विश्वविख्यात है। इन्हीं परंपराओं में सबसे ऊपर नाम आता है नंदा देवी राज जात का। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि एक बेटी की उसके मायके से ससुराल की ओर होने वाली उस विदाई का जीवंत चित्रण है, जो सदियों से गढ़वाल और कुमाऊं के लोगों के दिलों में रची-बसी है।

आस्था का स्वरूप: मायके से कैलाश तक का सफर
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी नंदा (जिन्हें माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है) का जन्म चमोली जिले के नौटी गाँव में हुआ था। भगवान शिव से विवाह के पश्चात, वह अपने ससुराल कैलाश चली गईं। इसी विदाई की स्मृति में हर 12 वर्ष में इस भव्य राज जात का आयोजन किया जाता है। भक्त इसे अपनी कुलदेवी की 'बिदाई' मानकर अत्यंत भावुक और श्रद्धापूर्ण तरीके से संपन्न करते हैं।

यात्रा का दुर्गम मार्ग और चुनौतियां
यह यात्रा चमोली के नौटी गाँव से शुरू होकर होमकुंड तक पहुँचती है। लगभग 280 किलोमीटर की इस लंबी पदयात्रा को पूरा करने में 19 से 22 दिन लगते हैं।

भौगोलिक कठिनाइयां: श्रद्धालुओं को घने जंगलों, मखमली बुग्यालों (घास के मैदानों) और बर्फीले दर्रों से गुजरना पड़ता है।

ऊंचाई: यात्रा के दौरान भक्तों को 5,000 मीटर से भी अधिक की ऊँचाई तक चढ़ाई करनी पड़ती है, जो इसे दुनिया के सबसे कठिन धार्मिक ट्रेक में शुमार करती है।

रहस्यमयी चार सींग वाला मेढ़ा
इस यात्रा की सबसे अनोखी और चमत्कारी विशेषता चार सींग वाला मेढ़ा है। स्थानीय लोग इसे देवी का दूत मानते हैं। विडंबना और आश्चर्य यह है कि यह मेढ़ा पूरी यात्रा में श्रद्धालुओं की अगुवाई करता है। अंत में, जब यात्रा होमकुंड पहुँचती है, तो यह मूक प्राणी भारी भीड़ को पीछे छोड़कर अकेले ही निर्जन हिमालयी चोटियों की ओर निकल जाता है। माना जाता है कि वह देवी के साथ कैलाश चला गया है।

सातवीं सदी से जुड़ा गौरवशाली इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार, इस राज जात की नींव 7वीं शताब्दी में गढ़वाल नरेश शालिपाल ने रखी थी। बाद में 9वीं सदी में राजा कनकपाल ने इसे व्यवस्थित रूप प्रदान किया। समय के साथ, यह आयोजन न केवल धार्मिक रहा, बल्कि गढ़वाल और कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन गया।

2026: अगले पड़ाव की प्रतीक्षा
अभिलेखों के अनुसार, पिछली यात्राएं 1987, 2000 और 2014 में आयोजित हुई थीं। चूँकि यह यात्रा हर 12 वर्ष में होती है, इसलिए अब अगली नंदा देवी राज जात यात्रा वर्ष 2026 में प्रस्तावित है। यह यात्रा आमतौर पर अगस्त-सितंबर के महीने में शुरू होती है।

नंदा देवी राज जात मनुष्य और प्रकृति के बीच के उस गहरे संबंध को दर्शाती है, जहाँ ऊँचे पहाड़ और कठिन रास्ते भी आस्था के आगे छोटे पड़ जाते हैं। 2026 में होने वाली इस महायात्रा का इंतजार अब न केवल उत्तराखंड के लोगों को है, बल्कि दुनिया भर के उन पर्यटकों और श्रद्धालुओं को भी है, जो हिमालय की इस जीवित संस्कृति का हिस्सा बनना चाहते हैं।

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