Edited By Prachi Sharma,Updated: 05 Mar, 2026 07:54 AM

Saint Tukaram Jayanti 2026 : भारतीय इतिहास में 17वीं शताब्दी एक ऐसे बदलाव का गवाह बनी, जिसने न केवल धर्म बल्कि समाज के सोचने के नजरिए को भी बदल दिया। इस बदलाव के सूत्रधार थे संत तुकाराम। महाराष्ट्र की पावन धरती पर जन्मे तुकाराम जी ने कर्मकांडों और...
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
Saint Tukaram Jayanti 2026 : भारतीय इतिहास में 17वीं शताब्दी एक ऐसे बदलाव का गवाह बनी, जिसने न केवल धर्म बल्कि समाज के सोचने के नजरिए को भी बदल दिया। इस बदलाव के सूत्रधार थे संत तुकाराम। महाराष्ट्र की पावन धरती पर जन्मे तुकाराम जी ने कर्मकांडों और आडंबरों के बजाय प्रेम और समानता का मार्ग चुना।
प्रारंभिक जीवन और विरक्ति का मार्ग
संत तुकाराम का जन्म सन् 1598 में महाराष्ट्र के देहू गाँव में हुआ था। उनके पिता बोल्होबा और माता कनकाई ने उन्हें ऊंचे संस्कार दिए लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब वे मात्र 18 वर्ष के थे, तब उनके माता-पिता का साया सिर से उठ गया। 17वीं सदी के दौरान आए एक विनाशकारी अकाल ने उनके जीवन को झकझोर कर रख दिया। इस त्रासदी में उन्होंने अपनी पहली पत्नी और छोटे पुत्र को खो दिया। इन दुखों ने उन्हें संसार की नश्वरता का बोध कराया और उनका मन विरक्त हो गया।
अध्यात्म की खोज
जब सांसारिक कार्यों में उनका मन नहीं लगा, तो वे शांति की तलाश में भावनाथ नामक पहाड़ी पर जाने लगे। वहां वे घंटों भगवान विट्ठल के ध्यान में मग्न रहते। इसी दौरान एक साधु से मिले 'हरि मंत्र' ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वे एक साधारण गृहस्थ से एक महान संत और कवि बन गए।

भक्ति आंदोलन और वारकरी संप्रदाय
संत तुकाराम को भक्ति आंदोलन का प्रमुख स्तंभ माना जाता है। उन्होंने अपने अभंगों और दोहों के माध्यम से समाज में व्याप्त ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव पर कड़ा प्रहार किया। आज भी महाराष्ट्र का 'वारकरी' समुदाय उन्हें अपना आराध्य और पथ-प्रदर्शक मानता है।
क्षमा की शक्ति
संत तुकाराम की सहनशीलता का एक अद्भुत किस्सा आज भी लोगों को प्रेरित करता है। एक बार उनकी भैंस ने उनके पड़ोसी की फसल खराब कर दी। पड़ोसी ने क्रोध में आकर संत तुकाराम को बहुत बुरा-भला कहा और उन पर हाथ उठाने तक की कोशिश की। तुकाराम जी ने बिना कोई विरोध किए सब सहन कर लिया। अगले दिन जब वही पड़ोसी उनके प्रवचन में आया, तो संत तुकाराम ने पूरे जनसमूह के सामने उससे माफी मांगी। उनकी इस विनम्रता ने उस कठोर हृदय पड़ोसी को पिघला दिया और वह उनके चरणों में गिर पड़ा। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि क्षमा क्रोध से कहीं अधिक शक्तिशाली है।
विरासत
माना जाता है कि सन् 1650 (कुछ स्रोतों के अनुसार 1571) के आसपास उन्होंने अपनी देह त्याग दी। उनके लिखे अभंग आज भी महाराष्ट्र के घर-घर में गाए जाते हैं, जो शांति, संयम और ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम का संदेश देते हैं।
