Edited By Niyati Bhandari,Updated: 22 Apr, 2026 11:36 AM

Ganga Saptami katha 2026: गंगा सप्तमी 2026 (23 अप्रैल) के अवसर पर जानें मां गंगा के पुनर्जन्म की रोचक कथा। जाह्नवी ऋषि ने क्यों पी लिया था गंगा का जल?
Ganga Saptami katha 2026: सनातन धर्म में मां गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी शक्ति माना गया है। वर्ष 2026 में 23 अप्रैल, गुरुवार को देशभर में गंगा सप्तमी का पावन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मां गंगा के 'पुनर्जन्म' के रूप में पूजा जाता है। गंगा सप्तमी की यह तिथि मां गंगा की निर्मलता और उनके दिव्य अस्तित्व का उत्सव है।
Ganga Saptami katha गंगा सप्तमी कथा: प्राचीन कथा के अनुसार जब कपिल मुनि के श्राप से सूर्यवंशी राजा सगर के 60 हज़ार पुत्र जल कर भस्म हो गए, तब उनके उद्धार के लिए सगर के वंशज भागीरथ ने घोर तपस्या की। अपनी कठिन तपस्त्या के बल पर उन्होंने गंगा को प्रसन्न किया और धरती पर लाने में कामयाब हुए। गंगा जल का स्पर्श करते ही सगर के 60 हज़ार पुत्रों का उद्धार हुआ।
शास्त्रों ने गंगा को मोक्षदायिनी कहा है। हिंदू धर्म में ऐसा भी माना जाता है की जब तक मृत व्यक्ति की अस्थियां गंगा में प्रवाहित न की जाएं, उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। पुराणों ने गंगा को मन्दाकिनी रूप में स्वर्ग, गंगा के रूप में पृथ्वी व भोगवती रूप में पाताल में प्रवाहित होते हुए वर्णित किया गया है।
विष्णु पुराण में कहा गया है गंगा भगवान श्री हरि विष्णु के बायें पैर के अंगूठे के नख से प्रवाहित होती हैं। कुछ विद्वानों का मत है की भगवान शिव ने ब्रह्मस्वरूपिणी गंगा को इसलिए अपने शीश पर धारण किया क्योंकि वो श्री हरि विष्णु का चरणामृत हैं।
महादेव ने अपनी जटा से गंगा को सात धाराओं में अलग-अलग किया। जिनमें नलिनी, ह्लदिनी व पावनी पूर्व में, सीता, चक्षुस व सिन्धु पश्चिम में व सातवीं धारा भागीरथी प्रवाहित हुई।
पौराणिक आख्यान के अनुसार ये भी कहा जाता है की गंगा हिमालय व मैना की बेटी और भगवान शिव की अद्धागिनि उमा की बहन हैं। गंगा का सम्बन्ध कार्तिकेय के मातृत्व से भी माना जाता है।

Sage Jahnavi Rishi Jahnu katha जाह्नवी ऋषि (ऋषि जह्नु) से जुड़ी कथा: राजा भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर गंगा जी पृथ्वी की ओर बढ़ रही थीं, तब उनके वेग ने ऋषि जह्नु की कुटिया और सामान को बहा दिया। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने अपनी तपोशक्ति से गंगा के समस्त जल को पी लिया। राजा भगीरथ की अनुनय-विनय के बाद, ऋषि शांत हुए और उन्होंने गंगा को अपने कान से बाहर निकाला। ऋषि की संतान के रूप में दोबारा प्रकट होने के कारण ही गंगा का नाम 'जाह्नवी' पड़ा।
