Kedarnath Jyotirlinga katha: केदारनाथ धाम में होती है महादेव के भैंसा रूप की पूजा? जानें पांडवों से जुड़ी केदारनाथ ज्योतिर्लिंग कथा

Edited By Updated: 04 Jun, 2026 11:59 AM

kedarnath jyotirlinga katha

Kedarnath Jyotirlinga katha: जानें, केदारनाथ धाम का इतिहास और पांडवों से जुड़ी वह रोचक कथा जिसके कारण यहां भगवान शिव के भैंसा रूप की पूजा की जाती है।

Kedarnath Jyotirlinga katha: उत्तराखंड की खूबसूरत पहाड़ियों और रुद्रप्रयाग जिले की गोद में बसा केदारनाथ धाम न केवल चार धामों में से एक है, बल्कि इसे भगवान शिव के 11वें ज्योतिर्लिंग के रूप में भी पूजा जाता है। हर साल लाखों श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन के लिए दुर्गम रास्तों को पार कर यहां पहुंचते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मंदिर का इतिहास और इसकी पूजा पद्धति कितनी अनोखी है? यहां भगवान शिव की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है बल्कि एक भैंसे की पीठ के समान आकृति की पूजा होती है। आइए जानते हैं, इसके पीछे छिपी पांडवों की वह रोचक कथा।

PunjabKesari Kedarnath Jyotirlinga katha

महाभारत युद्ध के बाद का पश्चाताप
महाभारत-युद्ध में विजयी होने के पश्चात पांडव भ्रात हत्या व अन्य हत्याओं से मुक्ति के लिए भगवान शिव शंकर का साक्षात आशीर्वाद चाहते थे पर शिव महादेव उनसे रुष्ट थे। पांडव उनके दर्शन पाने के लिए काशी (वाराणसी) गए पर उन्हें पा नहीं सके। तब वे शिव शंकर को ढूंढते हुए हिमालय पहुंचे पर अपने निश्चित स्थान से शिव अंतर्ध्यान होकर केदार में आ बसे क्योंकि वे पांडवों को दर्शन देना नहीं चाहते थे। 

PunjabKesari Kedarnath Jyotirlinga katha

जब भगवान शिव ने लिया भैंसे का रूप
पांडव भी धुन के पक्के निकले। आस्था, श्रद्धा व लगन पूर्वक ढूंढते हुए केदार भी पहुंच गए। तब शिव ने बसहा-बैल का रूप धारण किया और अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को शंका हो गई। तब भीमसेन ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पर्वतों पर अपने पैर फैला लिए। सभी गोवंश उनके पैरों के नीचे से निकल गए पर शंकर रूपी बैल नीचे से नहीं निकले, तब भीम बलपूर्वक झपटे और बैल को कसकर पकड़ लिया, तब बैल भूमि में समाने लगा। तभी भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ (महादेव शरीर) का हिस्सा पकड़ लिया और नहीं छोड़ा। तब भगवान शंकर ने पांडवों की श्रद्धा, भक्ति, आस्था से प्रसन्न होकर उन्हें प्रकट तत्काल दर्शन दिया और उन्हें पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शिव शंकर रूपी बैल की पीठ (महादेव) की आकृति का पिंड श्री केदारनाथ के नाम से पूजित हुआ।

PunjabKesari Kedarnath Jyotirlinga katha

भैंसे की पीठ की पूजा का महत्व
हिमालय ‘देवभूमि’ है। सौंदर्य भरी वादियों से घिरे केदारनाथ की यात्रा स्वत: आनंद का स्रोत है। चहुं ओर मनोहारी दृश्य देख कर मन आनंद विभोर हो उठता है। शैव सम्प्रदाय में एवं शिव भक्तों में बैल की उभरी पीठ यानी गर्दन के बाद जो शिवलिंग के समान उठी हुई आकृति प्राकृतिक रूप से बन जाती है, के समान केदारनाथ में स्वरूप शिवपिंड की बड़ी मान्यता व विशेष महत्व है। अत: दर्शन पाने के लिए भक्त गण सब कुछ प्रसन्नता से सहने को तैयार रहते हैं। 

PunjabKesari Kedarnath Jyotirlinga katha

केदारनाथ में शिवपिंड तक कैसे पहुंचे
अब हरिद्वार व ऋषिकेश से सड़क मार्ग से जाने के लिए विभिन्न वाहन प्राप्त हैं। विभिन्न प्रमुख नगरों से रेल मार्ग से या सड़क मार्ग से हरिद्वार-ऋषिकेश जा सकते हैं। केदारनाथ के कपाट अक्षय तृतीया को खुलकर लगभग तीन माह खुले रहते हैं।   

PunjabKesari Kedarnath Jyotirlinga katha

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ

 

 

Related Story

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!