क्या पृथ्वी ही अंतिम ठिकाना है ? जानें आत्मा की अदृश्य यात्रा का रहस्य

Edited By Updated: 25 Feb, 2026 01:11 PM

karma theory

सृष्टि में प्रत्येक वस्तु या तो उन्नति की ओर अग्रसर है या पतन की ओर, यहां कुछ भी स्थिर नहीं है। वर्तमान में हम पृथ्वी पर निवास कर रहे हैं किंतु यदि कोई यह सोचता है कि वह जन्म-जन्मांतर तक यहीं रहेगा

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Karma Theory : सृष्टि में प्रत्येक वस्तु या तो उन्नति की ओर अग्रसर है या पतन की ओर, यहां कुछ भी स्थिर नहीं है। वर्तमान में हम पृथ्वी पर निवास कर रहे हैं किंतु यदि कोई यह सोचता है कि वह जन्म-जन्मांतर तक यहीं रहेगा, तो यह एक भ्रांति है। सृष्टि की अन्य वस्तुओं की भांति, एक जीव भी ऊपर या नीचे की ओर गति करता है। पृथ्वी अस्तित्व का केवल एक स्तर है, इसके परे और इसके नीचे अन्य आयाम भी विद्यमान हैं।

पृथ्वी का आयाम जिसे भूलोक कहा जाता है, विशेष है क्योंकि यहां से व्यक्ति अपनी इच्छा और संचित कर्मों के आधार पर किसी भी अन्य आयाम तक पहुंच सकता है। भुव लोक, पृथ्वी से उच्चतर लोक है, जहां केवल पूर्ण वैराग्य के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है। इसके पश्चात स्वर्ग लोक आता है, जहां देवताओं की संस्तुति से प्रवेश संभव है। देवताओं को प्रसन्न कर स्वर्ग लोक प्राप्त करने के लिए विशिष्ट मंत्र निर्धारित हैं।

स्वर्ग से ऊपर के लोक को मह: लोक कहा जाता है, यह उन सत्ताओं का आयाम है जो स्वर्ग के पात्र तो हैं, किंतु वहां के सुखों को भोगने की इच्छा नहीं रखते। इसके परे जनः लोक है। यहां वे निवास करते हैं जो संपूर्ण सृष्टि को संचालित करने वाले सॉफ्टवेयर के निर्माण हेतु उत्तरदायी हैं। अगला आयाम तपः लोक है, जो उन के लिए है जो तपस्या के अभिलाषी हैं। उनके तप से उत्पन्न ऊर्जा सूर्य को शक्ति प्रदान करती है, जिससे समस्त सृष्टि चलायमान है।

अंतिम आयाम सत्य लोक है जहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश निवास करते हैं। केवल वे आत्माएं जिनमें इन ऊर्जाओं में विलीन होने की अडिग इच्छा होती है, यहां पहुंच पाती हैं। शिव धाम के द्वार पर भूत, प्रेत और पिशाच के रूप में गण होते हैं, जो साधक को प्रवेश करने से रोकने का प्रयास करते हैं। नंदी, भगवान शिव के प्रिय गणों में से एक हैं, जो साधक की समस्त शारीरिक और भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करते हैं ताकि वह उनमें ही निमग्न रहे और शिव धाम की ओर अग्रसर न हो सके। यद्यपि पृथ्वी पर प्रकाश की गति सर्वाधिक है फिर भी यह एक पूरे जीवनकाल में इन आयामों को पार नहीं कर सकता। केवल विचार ही हमें इन आयामों तक ले जा सकते हैं।

पृथ्वी से नीचे के आयाम— अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल हैं, जिन्हें हमें केवल पढ़कर विस्मृत कर देना चाहिए। ये उन जीवों के लिए हैं जो सेवा और दान से रहित, स्वार्थपूर्ण जीवन जीते हैं  दूसरे शब्दों में, अंधकारमय जीवन। इसमें वे जीव सम्मिलित हैं जो दूसरों को हानि पहुंचाते हैं या दूसरों के कष्ट निवारण में सक्ष्म होने के बाद भी मुंह मोड़ लेते हैं। इन आत्माओं को कष्ट, भय, संवृतिभीति और कीचड़ जैसी चिपचिपाहट के माध्यम से शुद्धिकरण की प्रक्रिया हेतु इन निम्न लोकों में भेजा जाता है। निम्न लोक अंधकारमय हैं क्योंकि वहां के निवासी केवल अंधकार की ही कामना करते हैं। इन आयामों में आत्माओं द्वारा धारण किए गए रूप स्थूल, घिनौने, कष्टदायक और सदैव भय से युक्त होते हैं।

किसी भी अन्य लोक चाहे उच्च हो या निम्न में जाने की पात्रता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को भूलोक में आना ही पड़ता है। अन्य सभी लोकों में जीव की अवधि निर्धारित होती है, जिसकी समाप्ति के पश्चात उसे पुनः भूलोक लौटना पड़ता है। यहां तक कि भगवान विष्णु को भी, जो सत्य लोक के एक सूक्ष्म भाग वैकुंठ में निवास करते हैं, सृष्टि के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन हेतु भूलोक में अवतरित होना पड़ता है।

अतः एक गुरु की खोज करें और इस आयाम में अपने उपलब्ध समय का सर्वोत्तम उपयोग करें। गुरु के सानिध्य में योग वास्तविक अनुभवों की यात्रा है न कि दिवास्वप्न देखने वालों की दुनिया जहां आपको केवल दूसरों के अनुभवों की कथाएं और कहानियां सुनाई जाती हैं या जहां आप नाचते-गाते और कहानियां सुनते हैं और अंततः आर्थिक रूप से रिक्त होकर लौटते हैं। यह यथार्थ की यात्रा है और यह आपकी अपनी व्यक्तिगत यात्रा है।

अश्विनी गुरुजी ध्यान आश्रम

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