Edited By Sarita Thapa,Updated: 15 Feb, 2026 11:27 AM
भगवान शिव के निराकार से साकार रूप में प्रकट होने का पर्व है महाशिवरात्रि। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व भक्तों के लिए सौभाग्यशाली एवं महान पुण्य अर्जित करने वाला है।
Mahashivratri Spiritual Significance : भगवान शिव के निराकार से साकार रूप में प्रकट होने का पर्व है महाशिवरात्रि। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व भक्तों के लिए सौभाग्यशाली एवं महान पुण्य अर्जित करने वाला है। शिवरात्रि का अर्थ ही है ‘कल्याण की रात्रि’। पूरे दिन और रात्रि के चारों प्रहर भगवान भोलेनाथ जी के शिवलिंग का दुग्ध, गंगाजल, बिल्व पत्र से मंत्रोच्चारण के द्वारा रुद्राभिषेक किया जाता है।
फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए इस पर्व को शिव और पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है। भूतभावन भगवान सदाशिव की प्रसन्नता के लिए ‘रुद्रसूक्त’ पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा में भगवान शंकर को सबसे प्रिय जलधारा है इसलिए भगवान शिव के पूजन में रुद्राभिषेक की पर परा है और अभिषेक में इस ‘रुद्रसूक्त’ से भगवान शिव की स्तुति की गई है -
‘हे कैलाश पर शयन करने वाले! आपको प्राप्त करने के लिए हम मंगलमय वचन से आपकी स्तुति करते हैं। जिस प्रकार हमारा समस्त संसार तापरहित, निरोग और निर्मल मनवाला बने, वैसा आप करें।’
यह ‘रुद्रसूक्त’ आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक-त्रिविध तापों से मुक्त कराने वाला तथा अमृतत्व की ओर अग्रसर करने वाला है। भगवान रुद्र ही जग सृष्टिकर्ता ब्रह्मा तथा जग पालन-पोषणकर्ता भगवान विष्णु हैं और सभी देवता रुद्र के ही अंश हैं। इस स पूर्ण चराचर जगत में सभी कुछ रुद्र से ही जन्मा हुआ है। वही ब्रह्म हैं और वही वेद विहित यज्ञपुरुष स्वयंभू रुद्र ही हैं। शिव पुराण संहिता में कहा है कि सर्वज्ञ भगवान शिवशंकर ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए इस ‘ú नम: शिवाय’ मंत्र का प्रतिपादन किया है।

यह आदि मंत्र संपूर्ण विद्याओं का बीज है। यह घोर संसार सागर अनादिकाल से चला आ रहा है, उसी प्रकार भवसागर से पार लगाने वाले भगवान शिव भी अनादिकाल से ही नित्य विराजमान हैं। जैसे औषध रोगों का स्वभावत: शत्रु है, उसी प्रकार भगवान शिव संसार दोषों से छुड़ाने वाले हैं। भगवान शिव आदि, मध्य और अंत से रहित हैं।भगवान भोलेनाथ स्वभाव से ही निर्मल हैं तथा सर्वज्ञ एवं परिपूर्ण हैं। ‘ú नम: शिवाय’ मंत्र उन्हीं शिव का स्वरूप है। जिसके हृदय में ‘ú नम: शिवाय’ यह षडक्षर मंत्र प्रतिष्ठित है, उसने संपूर्ण शास्त्रों का अध्ययन कर लिया और समस्त शुभ कृत्यों का अनुष्ठान पूरा कर लिया। लंका प्रवेश के लिए समुद्र पर सेतु निर्माण के समय भगवान श्रीराम ने रामेश्वरम में महादेव जी को प्रसन्न करने के लिए स्वयं शिवलिंग की स्थापना की और भगवान शिव का आह्वान किया था जोकि श भु स्तुति के नाम से ब्रह्म पुराण में वर्णित है-
‘मैं पुराणपुरुष शभु को नमस्कार करता हूं जिनकी असीम सत्ता का कहीं पार या अंत नहीं है, उन सर्वज्ञ शिव को मैं प्रणाम करता हूं। अविनाशी प्रभु रुद्र को नमस्कार करता हूं। सबका संहार करने वाले ‘शर्व’ को मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूं। समस्त चराचर विश्व के स्वामी विश्वेश्वर, नरकरूपी संसार सागर से उद्धार करने वाले, गौरी के अत्यंत प्रिय, संसार रूपी रोग एवं भय के विनाशक, दुर्गम भवसागर से पार कराने वाले, काल के लिए भी महाकालस्वरूप, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अत्यंत प्रिय, समस्त देवताओं से सुपूजित, दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।’

समुद्र मंथन के समय जब कालकूट विष प्रकट हुआ विश्व को विनाश से बचाने के लिए तब भगवान भोलेनाथ ने इसे अपने कंठ में धारण किया जिनसे आपका कंठ नीला पड़ गया और आप नीलकंठ कहलाए। भगवान शिव भक्तों के कल्याण हेतु तथा उनके अनुरोध पर भारतवर्ष के विभिन्न तीर्थों में ज्योतिर्लिंगों के रूप में स्थायी रूप से निवास करते हैं। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए :
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम्॥
परल्यां वैजनाथं च डाकियन्यां भीमशंकरम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वारणस्यां तु विश्वेशं त्र्य बकं गौतमी तटे।
हिमालये तु केदारं ध्रुष्णेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिॄलगानि सायं प्रात: पठेन्नर:।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरेण विनश्यति॥
इन ज्योतिर्लिंगों के स्मरण मात्र से ही मनुष्य पाप रहित होकर आशुतोष भगवान भोलेनाथ का सानिध्य प्राप्त कर लेता है। तुलसीदास जी भगवान शिव शंकर जी की स्तुति में कहते हैं- श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की मैं वंदना करता हूं, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्त:करण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते। पार्वतीनाथ भोलेनाथ जी जिनके मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्ष:स्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहारकर्ता, सर्वव्यापक, कल्याण रूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्री शंकरजी सदा हमारी रक्षा करें।

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