अस्तित्व या अंत ? जानिए क्या आप वाकई अपनी जिंदगी जी रहे हैं या बस कैलेंडर की तारीखें बदल रहे हैं

Edited By Updated: 14 Feb, 2026 04:42 PM

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जो समय का महत्व और स्वरूप समझ सका और उसके सदुपयोग के लिए समग्र जागरूकता के साथ तत्पर हो गया, समझना चाहिए कि उसे जिंदगी मिल गई अन्यथा इस ओर उपेक्षा बरतने वाले, आलसी बन कर रहने वाले अपने हाथों अपना ही सर्वनाश करते चले जाते हैं।

Motivational Story : जो समय का महत्व और स्वरूप समझ सका और उसके सदुपयोग के लिए समग्र जागरूकता के साथ तत्पर हो गया, समझना चाहिए कि उसे जिंदगी मिल गई अन्यथा इस ओर उपेक्षा बरतने वाले, आलसी बन कर रहने वाले अपने हाथों अपना ही सर्वनाश करते चले जाते हैं। जिस प्रकार बहुमूल्य मणि-मुक्ताओं को फटी थैली में भरकर चलने वाले राह में उन्हें टपकाते जाते हैं और घर पहुंचते-पहुंचते उस निधि को गंवाकर खाली हाथ रह जाते हैं, उसी प्रकार समय के साथ उपेक्षा करने वाले अपने आप के साथ एक क्रूर मजाक करते हैं। अपने भविष्य के साथ यह एक मर्मभेदी व्यंग्य है कि जीवन के बहुमूल्य क्षणों को ऐसे ही खोते-गंवाते चला जाए।

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हम क्रमश: मर रहे हैं। जीवन की स पदा का एक-एक दाना एक-एक क्षण के साथ समाप्त होता चला जाता है। बूंद-बूंद पानी टपकते रहने से भरा-पूरा किन्तु फूटा घड़ा थोड़े ही समय में खाली हो जाता है। जीवन की रत्न स पदा हर सांस के साथ घटती चली जाती है। 

क्रमश: हमारा हर कदम मरण की ओर ही उठता है। आयु वृद्धि के साथ-साथ मरण का दिन निकट से निकटतम आता चला जाता है। जो दैवी वरदान जैसा अमूल्य था, जिसके आधार पर कुछ भी खरीदा-पाया जा सकता है, वह किस प्रकार गलता-जलता, टूटता और मिटता चला जा रहा है, इसे देखने की न इच्छा होती है, न फुर्सत है।

फलत: हमारा अनुपम अस्तित्व भूत बनता चला जाता है। इस प्रकार असामयिक मृत्यु की भयंकरता तथाकथित भूत-प्रेतों से कम नहीं।

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जब समय के सदुपयोग और दुरुपयोग के परिणामों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है, तब प्रतीत होता है कि तत्परता और उपेक्षा के बीच दिखाई पड़ने वाला नगण्य-सा अंतर अंतत: कितने भारी भिन्न परिणामों के रूप में सामने आता है। समय ही जीवन है, समय ही उत्कर्ष है, समय ही महानता के उच्चतम शिखर तक पहुंचने का सोपान है। महाकाल की उपासना का जो स्वरूप समझ सका है, उसी को मृत्युंजयी बनने का सौभाग्य मिला है और किसी के साथ भी मखौल किया जा सकता है, पर महाकाल के साथ नहीं।

सिंह के दांत गिनने की धृष्टता किसी को नहीं करनी चाहिए। समय के दुरुपयोग की भूल अपने भाग्य और भविष्य को ठुकराने-लतियाने की तरह है। जो समय गंवाया है वह अपने उत्कर्ष और आनंद का द्वार ही बंद करता है। मरण की दिशा में हम द्रुतगति से घिसटते चले जा रहे हैं। खोने और गंवाने का दुर्भाग्य प्रमादियों के पल्ले बंधता है पर जो जीवन स पदा से लाभान्वित होने के लिए जागरूक हैं, उन्हें सांसों के बहुमूल्य मणि-मुक्तकों का ध्यान रहता है और वे एक घड़ी भी निरर्थक नहीं गंवाते। योजनाबद्ध दिनचर्या बनाते हैं और उसका पालन करते हैं। वे जानते हैं कि समय की स पदा को प्रमाद के श्मशान में जलाने वालों को आत्म प्रताड़ना की आग में जलना पड़ता है। 

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