जन्माष्टमी के 14 दिन बाद और राधा अष्टमी से एक दिन पहले क्यों मनाई जाती है ललिता सप्तमी, जानें इसकी धार्मिक मान्यता

Edited By Updated: 17 Sep, 2026 03:00 PM

lalita saptami significance

हिंदू परंपरा में भाद्रपद का महीना भक्ति, प्रेम और त्योहारों का माना जाता है। इस पावन माह  में जहां श्री कृष्ण  जन्माष्टमी और राधा अष्टमी की धूम रहती हैं, वहीं  इन दोनों पर्वों के बीच एक और बहुत खास और महत्वपूर्ण पवित्र तिथि आती है, जिसे ललिता सप्तमी...

Lalita Saptami Significance : हिंदू परंपरा में भाद्रपद का महीना भक्ति, प्रेम और त्योहारों का माना जाता है। इस पावन माह  में जहां श्री कृष्ण  जन्माष्टमी और राधा अष्टमी की धूम रहती हैं, वहीं  इन दोनों पर्वों के बीच एक और बहुत खास और महत्वपूर्ण पवित्र तिथि आती है, जिसे ललिता सप्तमी कहा जाता है। पंचांग के अनुसार, ललिता सप्तमी का यह पर्व कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 14 दिन बाद और राधा अष्टमी से ठीक 1 दिन पहले मनाया जाता है। लेकिन कई लोगों के मन में अक्सर यह सवाल बना रहता है कि राधा अष्टमी से एक दिन पहले और जन्माष्टमी से 14 दिन बाद ही क्यों ललिता सप्तमी का व्रत रखा जाता है। तो आइए जानते हैं इस तिथि के महत्व के बारे में-

Lalita Saptami Significance

कौन हैं ललिता सखी?
शास्त्रों और ब्रज साहित्य के अनुसार, श्री कृष्ण और राधा रानी की सेवा में प्रमुख 8 सखियां हमेशा उपस्थित रहतकी हैं। लेकिन इनमें से ललिता सखी को सबसे पहला और प्रधान स्थान प्राप्त है। ललिता जी केवल  एक सखी नहीं, बल्कि श्री राधा रानी की सबसे करीबी मित्र, सलाहकार और रक्षक मानी जाती है। माना जाता है कि राधा-कृष्ण के अलौकिक मिलन और उनकी रासलीलाओं की मुख्य प्रबंधिका माता ललिता ही थीं।

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राधा अष्टमी से 1 दिन पहले मनाने का रहस्य
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ललिता जी का जन्म राधा रानी के जन्म से ठीक एक दिन पूर्व भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को हुआ था। अध्यात्म की दृष्टि से, ललिता जी को राधा रानी की मुख्य सेविका माना गया है। जैसे किसी महारानी के आने से पहले उनकी प्रधान सखी या व्यवस्थापिका सब तैयारियां पूरी करती है, ठीक वैसे ही ललिता जी का प्राकट्य दिवस राधा अष्टमी से एक दिन पहले आता है, ताकि वे अपनी स्वामिनी राधा जी के स्वागत की तैयारी कर सकें।

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जन्माष्टमी के 14 दिन बाद आने का ज्योतिषीय व पौराणिक कारण
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का जन्म होता है। इसके ठीक 14वें दिन ललिता सप्तमी आती है। पंचांग में एक पक्ष  5 दिनों का होता है। जन्माष्टमी से गिनने पर 14वें दिन भाद्रपद शुक्ल सप्तमी पड़ती है, जो कि ललिता जी का पावन प्राकट्य दिवस है। माना जाता है कि श्री कृष्ण और राधा रानी तक पहुंचने का मार्ग ललिता जी की कृपा से होकर गुजरता है। इसलिए जन्माष्टमी के बाद साधक ललिता सप्तमी का व्रत रखकर अपनी भक्ति को निपुण करते हैं।

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