Lohri 2026: 13 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है लोहड़ी? इतिहास और महत्व जानकर होंगे हैरान

Edited By Updated: 07 Jan, 2026 03:21 PM

lohri 2026

Lohri 2026: उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की ठंडी जनवरी की रातों में जब अग्नि के चारों ओर गीत, नृत्य और उल्लास दिखाई दे तो समझ लीजिए लोहड़ी आ गई है। लोहड़ी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और सूर्य उपासना से जुड़ा एक प्राचीन...

Lohri 2026: उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की ठंडी जनवरी की रातों में जब अग्नि के चारों ओर गीत, नृत्य और उल्लास दिखाई दे तो समझ लीजिए लोहड़ी आ गई है। लोहड़ी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और सूर्य उपासना से जुड़ा एक प्राचीन लोकपर्व है। हर वर्ष यह त्योहार मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लोहड़ी 13 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है?

Lohri 2026

Lohri 2026 Kab Hai?
हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में लोहड़ी 13 जनवरी, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से ठीक एक दिन पहले आता है। शास्त्रों में इस संधि काल को विशेष फलदायी माना गया है।

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लोहड़ी 13 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है?
धार्मिक दृष्टि से लोहड़ी सूर्य के उत्तरायण से पूर्व की अंतिम रात्रि का प्रतीक है। शास्त्रों में सूर्य को ऊर्जा, जीवन और अन्न का अधिपति माना गया है। 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, इसलिए उससे पहले की रात यानी 13 जनवरी को अग्नि देव की आराधना का विधान बना। अग्नि में तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करना ऋतु परिवर्तन, फसल सुरक्षा, देवताओं के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना गया है।

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लोहड़ी का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
लोहड़ी का इतिहास लोकनायक दुल्ला भट्टी से जुड़ा है, जिन्हें पंजाब का “रॉबिनहुड” कहा जाता है। उन्होंने मुगल काल में अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई और गरीब कन्याओं के विवाह में सहायता की। आज भी लोहड़ी के गीतों में उनका नाम श्रद्धा से लिया जाता है। यह पर्व न्याय, साहस और लोकधर्म का प्रतीक है।

लोहड़ी का सांस्कृतिक महत्व
लोहड़ी विशेष रूप से नवविवाहित दंपत्तियों नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। भांगड़ा, गिद्धा, ढोल की थाप और सामूहिक नृत्य यह सिखाते हैं कि खुशी तभी पूर्ण होती है जब वह समाज के साथ बांटी जाए। लोहड़ी केवल आग जलाने का पर्व नहीं, बल्कि परंपरा की लौ को जलाए रखने का संदेश है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि आधुनिक जीवन में भी प्रकृति, कृषि और संस्कृति से जुड़ाव आवश्यक है।

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