Maa Vindhyavasini : विंध्याचल में लाखों श्रद्धालुओं के स्वागत की तैयारी, जानिए क्यों खास है मां विंध्यवासिनी का दरबार

Edited By Updated: 19 Mar, 2026 09:42 AM

maa vindhyavasini

Maa Vindhyavasini Dham : नवरात्रि के अवसर पर विंध्याचल धाम में हर साल लाखों श्रद्धालु मां विंध्यवासिनी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने मेला क्षेत्र में व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। पूरे मेला...

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Maa Vindhyavasini Dham : नवरात्रि के अवसर पर विंध्याचल धाम में हर साल लाखों श्रद्धालु मां विंध्यवासिनी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने मेला क्षेत्र में व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। पूरे मेला क्षेत्र को 10 जोन और 21 सेक्टर में बांटा गया है, ताकि व्यवस्था और सुरक्षा बेहतर तरीके से संभाली जा सके। सुरक्षा के लिहाज से तीन कंपनियां पीएसी की तैनात की गई हैं, वहीं जल क्षेत्र में निगरानी के लिए फ्लड पुलिस भी लगाई गई है।

इसके अलावा असामाजिक तत्वों पर नजर रखने के लिए कई विशेष इंतजाम किए गए हैं। मेला क्षेत्र में 10 मोबाइल यूनिट लगातार गश्त करेंगी। यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए करीब 200 ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है। श्रद्धालुओं के वाहनों के लिए 22 पार्किंग स्थल बनाए गए हैं। सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए सादे कपड़ों में भी पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। वहीं पूरे मेला क्षेत्र में करीब 200 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिनके जरिए हर गतिविधि पर नजर रखी जाएगी।

मां विंध्यवासिनी की पौराणिक कथा
मां विंध्यवासिनी को देवी की महाशक्ति स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि वही इस सृष्टि की मूल शक्ति हैं, जिनसे संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन होता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार विंध्याचल पर्वत को मां विंध्यवासिनी का स्थायी निवास स्थान माना जाता है। इसी कारण यह स्थान एक जागृत शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है, जहां भक्तों का विश्वास है कि देवी हमेशा विराजमान रहती हैं।

महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर ने देवी की स्तुति करते हुए उल्लेख किया है कि मां विंध्यवासिनी पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचल पर निवास करती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल से ही इस स्थान का धार्मिक महत्व रहा है। पद्मपुराण में भी देवी को विंध्य पर्वत में निवास करने के कारण ‘विंध्यवासिनी’ कहा गया है।

देवीभागवत की कथा
श्रीमद् देवीभागवत में एक प्रसंग मिलता है, जिसके अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने मनु और शतरूपा की रचना की। विवाह के बाद मनु ने अपने हाथों से देवी की प्रतिमा बनाकर उनकी दीर्घकाल तक तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें सुखी जीवन, समृद्ध राज्य, वंश वृद्धि और अंत में मोक्ष का वरदान दिया।

अन्य मान्यताएं
एक और प्रचलित मान्यता के अनुसार यह स्थान मां सती के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि जब कंस ने देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान को मारने का प्रयास किया, तब वह कन्या योगमाया के रूप में उसके हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हुईं और कंस को चेतावनी देकर विंध्याचल पर्वत पर आकर विराजमान हो गईं।

इन सभी कथाओं में मां को आदिशक्ति के रूप में ही वर्णित किया गया है। यही कारण है कि हजारों वर्षों से यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सामान्य दिनों में भी यहां भक्तों की भारी भीड़ रहती है, लेकिन नवरात्रि के दौरान विंध्याचल धाम में भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत वातावरण देखने को मिलता है।

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