महात्मा सरयूदास से जानें, जीवन में संतोष और सहनशीलता का महत्व

Edited By Updated: 12 Dec, 2025 02:26 PM

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महात्मा सरयूदास का जन्म गुजरात के एक गांव में हुआ था। बचपन में उन्हें अपने पड़ोस में एक संत सत्संग सुनने का मौका मिला। उनकी शिक्षा-दीक्षा बहुत थोड़ी थी। वह अपने मामा के घर पर रह कर उनका व्यापार संभालते थे।

Motivational Story: महात्मा सरयूदास का जन्म गुजरात के एक गांव में हुआ था। बचपन में उन्हें अपने पड़ोस में एक संत सत्संग सुनने का मौका मिला। उनकी शिक्षा-दीक्षा बहुत थोड़ी थी। वह अपने मामा के घर पर रह कर उनका व्यापार संभालते थे। कुछ वर्षों के बाद सरयूदास का विवाह हो गया, पर उनकी पत्नी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकी। एक बार की बात है, सरयूदास रेलगाड़ी से कहीं जा रहे थे। गाड़ी में भारी भीड़ थी। कहीं तिल रखने की जगह नहीं थी।

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किसी तरह से महात्मा को गाड़ी में बैठने की जगह मिल गई। गाड़ी में महात्मा के पास ही एक मजबूत कद-काठी का व्यक्ति बैठा था। वह बार-बार उनकी ओर पैर बढ़ाकर उन्हें ठोकर मार देता था। महात्मा ने बड़े दयाभाव से कहा, ‘‘भाई संकोच मत करना, लगता है तुम्हारे पैर में कहीं पीड़ा है जिसे दिखाने को तुम बार-बार पैर मेरी ओर बढ़ाते हो फिर वापस खींच लेते हो मुझे सेवा का मौका दो मैं भी तुम्हारा अपना ही हूं।’’ 

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यह कहते हुए संत ने व्यक्ति का पैर उठाकर अपनी गोद में रख लिया और उसे सहलाने लगे। संत के ऐसा करने पर यात्री शर्मिंदा हुआ और क्षमा याचना करते हुए कहने लगा, ‘‘महाराज मेरा अपराध क्षमा करें। आप सही मायने में महात्मा हैं।’’

सहनशीलता ऐसा गुण है जिसे हमें अपने अंदर विकसित करना चाहिए। व्यक्ति का सहनशील होना ही उसे इस दुनिया में आगे ले जाता है। हृदय की विशालता का मूल्यांकन बाहरी वैभव से नहीं किया जा सकता। हृदय में संतोष है तो इंसान कुटिया में भी सुखी रहता है और असंतोष है तो ऐसा जीव महलों में भी सुखी नहीं है।

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