Edited By Niyati Bhandari,Updated: 23 Oct, 2026 06:40 AM

Rajyoga Meditation: क्या आप तनाव, क्रोध और आंतरिक अशांति से परेशान हैं? जानिए राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी से कि कैसे राजयोग के जरिए काम, क्रोध और अहंकार पर विजय पाकर परमात्मा से सीधे जुड़ा जा सकता है।
Rajyoga Meditation: यह तो सर्वसिद्ध तथ्य है कि सभी मनुष्यों के जीवन का प्रमुख लक्ष्य समस्त दुखों, क्लेशों, वासनाओं और अतृप्ति से मुक्त होकर सच्चे सुख-शांति और सुरक्षित जीवन को प्राप्त करना है। वैसे तो इस उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए समस्त विवेकवान पुरुष अपनी रुचि, बुद्धि व क्षमता के अनुसार विभिन्न साधनों का सहारा लिया करते हैं। इसके लिए धार्मिक जगत ने भी जप, तप, दान, पूजा-पाठ, तीर्थयात्रा तथा धर्मग्रंथ आदि के कई नुस्खे प्रदान किए लेकिन फिर भी यह रास्ता क्षणभंगुर सुख-शान्ति का ही रहा है। संसार में मानवता की रक्षा कैसे की जाए, इस बात का उपाय किसी की बुद्धि में नहीं आ पा रहा है।
कहा जाता है कि युद्ध या शान्ति की शुरूआत मन से होती है, उसी प्रकार, सुरक्षा का प्रारंभ भी मन की सुरक्षा से होता है। अत: यदि मानव का मन सुरक्षित और शक्तिशाली है तो बाहरी बाधाएं अपने आप अपना रास्ता नाप लेती हैं।
वस्तुत: देखा जाए तो हमारे मन के शत्रु कौन हैं? व उसे असुरक्षित कौन करते हैं? मन के शत्रु हैं काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार नामक पांच महाविकार और उनके बाल-बच्चे। जी हां! काम को ऋषि-मुनियों ने महाशत्रु कहा है, क्योंकि जब हमारे मन पर इसका वार होता है तब बाह्य जगत में भी बहुत अफरा-तफरी मचती है।
हम अभी इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि काम से आक्रान्त व्यक्ति लाज, शर्म भूल ऐसे कर्म करने पर उतारू हो जाता है, जिससे परिवार-समाज की शान्ति तक भंग हो जाती है।
ऐसे ही, क्रोध भी कोई कम शत्रु नहीं है। देखा जाए तो, आज चारों तरफ घटने वाली आपराधिक घटनाओं में से अधिकतर में इसी क्रोध का तो हाथ होता है। इसके कारण कई निर्दोष आत्माओं का खून बह जाता है।
इसी प्रकार से लोभ के पंजे में जकड़ा व्यक्ति भी कइयों के हक-हिस्से छीन कर, धन-पदार्थों को नाजायज रूप से ताले में बंद कर कइयों की रोजी-रोटी पर डाका डाल देता है।
हमारे शास्त्रों में मोह विकार को अंधा बनाने वाला कहा गया है, क्योंकि यह विकार तन और मन की आंखों पर पर्दा डाल व्यक्ति को मैं और मेरे के गंदे जल में गिरा देता है और अंतत: अहंकार से ग्रसित व्यक्ति जहरीले सर्प की तरह हर दम सभी को डंक मारता रहता है।
इन पांच महाविकारों के साथ-साथ इनके बाल-बच्चे भी आत्मा को असुरक्षित और कमजोर करने में बड़े माहिर होते हैं। जैसे, ईर्ष्या-द्वेष के वार से ठीक सोचने की बुद्धि नष्ट हो जाती है, बदले की भावना भूकम्प की तरह अंदर की स्थिरता को नष्ट कर देती है।
जिसकी आत्मा इन विकारों रूपी कीड़ों से खोखली हुई पड़ी है, तो फिर वह व्यक्ति कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हो, पर वह न स्वयं सुरक्षित रह सकता है और न ही प्राकृतिक विपत्तियों या हिंसा-दंगों का शमन कर सकता है। क्योंकि, जब उसके अपने भीतर ही उत्पात है तो वह बाहरी उत्पात को शांत कैसे करेगा।
अत: हमें यह समझना चाहिए कि सर्व प्रकार की सुरक्षा व सुख-शांति का आधार है। व्यक्ति की भीतरी मनोविकारों से रक्षा और इसका आधार है ‘राजयोग’ का अभ्यास।
राजयोग को ‘योगों का राजा’ कहा गया है क्योंकि इससे मन शुद्ध होता है और मन को शान्ति व एकाग्रता मिलती है किन्तु विश्व के अधिकांश लोग ऐसा समझते हैं कि ‘योग’ मात्र आसन या प्राणायाम ही हैं, परन्तु वास्तविक रूप से देखा जाए तो यह सही नहीं है, क्योंकि सरल भाषा में योग का अर्थ होता है ‘मिलन’।
जैसे अग्नि से चिंगारी निकलती है और उसे अग्नि से अलग भी कहा जाता है, परन्तु अग्नि बिना चिन्गारी का कोई अस्तित्व नहीं, यह भी तो एक वास्तविकता है। ठीक इसी तरह परमात्मा अग्नि हैं और हम सभी जीवात्मा चिंगारी हैं। दिखते भले ही दोनों अलग-अलग हैं, परन्तु हैं एक जैसे ही और इसी आत्मा व परमात्मा के मधुर मिलन को व आत्मिक एकता को यौगिक शब्दावली में ‘राजयोग’ कहा जाता है जिसे करने से जीवात्मा में आध्यात्मिक शक्तियां बढ़ती हैं और वह अतीन्द्रिय सुख के आनंद की अनुभूति करती हैं ।
इतना सब पढ़ने के पश्चात स्वाभाविक ही एक प्रश्न मन में उठता है कि राजयोग अन्य योगों से भिन्न कैसे है? सबसे बड़ा अंतर राजयोग और अन्य योगों में यही है कि इसमें साधक को अपने शरीर, शारीरिक सम्बन्ध और अन्य सभी अल्प बातों को भूलकर प्रकाश के बिंदु पर अर्थात ज्योति स्वरूप परमात्मा के ऊपर अपना सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करना है। राजयोग की सबसे बड़ी खूबी यह भी है कि हम इसका अभ्यास हमारी सभी नियमित क्रियाओं को करते हुए अपनी दिनचर्या में बिना कोई खलल के कर सकते हैं और न ही इसके अभ्यास के लिए हमें कोई विशेष आसन या मुद्रा में बैठने की आवश्यकता है क्योंकि यह एक ऐसा विशिष्ट योग है जिसे आप खुली आंखों से एवं चलते-फिरते भी कर सकते हैं।
राजयोग हमें स्वयं एवं ‘सर्वोच्च सर्वशक्तिमान’ परमात्मा को समझने का अद्वितीय अवसर प्रदान करता है और साथ-साथ समय चक्र, कर्म दर्शन और जीवन के कई ऐसे पहलुओं से हमें अवगत कराता है जिसके बारे में कभी हमने सुना या सोचा तक नहीं। तो आओ अपनी कर्मेंन्द्रियों पर जीत दिलाने वाले इस अनूठे योग का अभ्यास करें और अपने जीवन में अनंत काल के सुख, शांति एवं समृद्धि को प्राप्त करें।
—राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी