Edited By Niyati Bhandari,Updated: 08 Jan, 2026 02:09 PM

Kalpavas at the Magh Mela: हिंदू धर्म में माघ मास को तप, त्याग और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ काल माना गया है। इसी पवित्र मास में संगम तट पर किया जाने वाला कल्पवास एक ऐसी साधना है, जिसका उल्लेख वेद, पुराण और धर्मशास्त्रों में विस्तार से मिलता है। यह केवल...
Kalpavas at the Magh Mela: हिंदू धर्म में माघ मास को तप, त्याग और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ काल माना गया है। इसी पवित्र मास में संगम तट पर किया जाने वाला कल्पवास एक ऐसी साधना है, जिसका उल्लेख वेद, पुराण और धर्मशास्त्रों में विस्तार से मिलता है। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित कर मोक्ष की ओर अग्रसर करने वाली आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
कल्पवास क्या है?
कल्पवास माघ मास के दौरान गंगा, यमुना अथवा त्रिवेणी संगम के तट पर किया जाने वाला स्वेच्छा से लिया गया कठोर धार्मिक संकल्प है। इसमें साधक एक मास तक अत्यंत सादा जीवन जीते हुए ईश्वर की आराधना करता है।
कल्पवास के प्रमुख शास्त्रीय नियम
हिंदू पंचांग और धर्मशास्त्रों के अनुसार कल्पवास के मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
दिन में केवल एक बार स्वयं पकाया हुआ अल्पाहार या फलाहार
प्रमुख पर्वों पर उपवास
प्रतिदिन तीन बार गंगा, यमुना या संगम स्नान
त्रिकाल संध्या वंदन, जप, ध्यान और हवन
भूमि शयन, इंद्रिय संयम और ब्रह्मचर्य पालन
अतिथि सेवा, गो-विप्र और संन्यासी सेवा
सत्संग, देवार्चन, पितरों का तर्पण एवं मुंडन
गृहस्थों के लिए तीन बार स्नान श्रेष्ठ माना गया है, जबकि संन्यासी भस्म या धूलि स्नान से भी शुद्ध रह सकते हैं।
कौन कर सकता है कल्पवास?
कल्पवास स्त्री-पुरुष, गृहस्थ, विधवा और संन्यासी, सभी के लिए समान रूप से मान्य है।
विवाहित गृहस्थों को पति-पत्नी साथ कल्पवास करने का विधान
विधवा स्त्रियां स्वतंत्र रूप से कल्पवास कर सकती हैं
जाति, वर्ग या लिंग के आधार पर कोई भेद नहीं
कल्पवास में क्या वर्जित है?
हवन के अतिरिक्त अग्नि सेवन पूर्णतः निषिद्ध
विलासिता, अधिक वस्त्र, श्रृंगार और भोग से दूरी
केवल श्वेत या पीत, ऊनी या रेशमी वस्त्र धारण करने की शास्त्रीय सलाह
कल्पवास का आध्यात्मिक फल
पुराणों के अनुसार,एक कल्पवास का पूर्ण फल मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
इस साधना से
मन और शरीर दोनों का कायाकल्प
पापों का क्षय
आत्मिक शुद्धि और ईश्वर साक्षात्कार की अनुभूति होती है
कल्पवास की अवधि कब से कब तक?
कुछ स्थानों पर पौष शुक्ल एकादशी से माघ शुक्ल द्वादशी तक
कहीं-कहीं पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक एक माह का विधान
विशेष समाचार: किन्नर अखाड़े का ऐतिहासिक कल्पवास
इस वर्ष माघ मेले में किन्नर अखाड़े के 25 संत पहली बार पूर्ण विधि-विधान से कल्पवास कर रहे हैं।
2015 में स्थापित यह अखाड़ा—
किन्नरों के धार्मिक और सामाजिक अधिकारों के लिए कार्यरत
कई महामंडलेश्वर और मंडलेश्वर प्रदान कर चुका है
भारतीय सनातन परंपरा में समावेशिता का प्रतीक बनकर उभरा है
कल्पवास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, सेवा और साधना का दिव्य संगम है। शास्त्रों में वर्णित नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन कर मनुष्य अपने जीवन को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।