Edited By Niyati Bhandari,Updated: 27 Jan, 2026 09:47 AM

Tuesday Worship: सप्ताह में मंगलवार और शनिवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों श्रद्धा और सच्चे मन से की गई हनुमान जी की उपासना से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। कहा जाता है कि जो भक्त नियमित रूप...
Tuesday Worship: सप्ताह में मंगलवार और शनिवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों श्रद्धा और सच्चे मन से की गई हनुमान जी की उपासना से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। कहा जाता है कि जो भक्त नियमित रूप से हनुमान चालीसा, मंत्र और आरती का पाठ करता है, उस पर बजरंगबली की विशेष कृपा बनी रहती है।

साहस, शक्ति और भक्ति के प्रतीक हैं हनुमान जी
प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त भगवान हनुमान को साहस, शक्ति, भक्ति और अनुशासन का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार हैं। उनकी माता का नाम अंजना और पिता का नाम केसरी बताया गया है।
हनुमान जी को बजरंगबली, पवनपुत्र, मारुति, केसरीनंदन, अंजनीसुत जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से हनुमान जी की भक्ति करता है, उसके जीवन से भय, रोग और दुखों का नाश हो जाता है।
मंगलवार को करें विशेष पूजा
आज मंगलवार के दिन भक्तों के लिए यह उत्तम अवसर है कि वे हनुमान चालीसा, सुंदरकांड, हनुमान मंत्र और आरती का पाठ करें। माना जाता है कि मंगलवार को हनुमान जी की पूजा करने से शत्रु बाधा, मानसिक तनाव और आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
भगवान हनुमान का असली नाम क्या है? (Hanuman Ji Ka Asli Naam)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान हनुमान का जन्म नाम मारुति था। ‘मारुत’ वायु देव का एक नाम है, इसलिए मारुति का अर्थ हुआ – वायु का पुत्र।
हनुमान नाम कैसे पड़ा?
हनुमान नाम के पीछे एक रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, बचपन में मारुति ने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास किया। इस पर देवराज इंद्र ने उन्हें रोकने के लिए वज्र से प्रहार किया, जिससे उनकी हनु (ठुड्डी/जबड़ा) घायल हो गई।
संस्कृत में हनु का अर्थ ठुड्डी और मान का अर्थ विशिष्ट होता है। इसी कारण उनका नाम हनुमान पड़ा। इसके बाद से वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए।

Hanuman Chalisa Hindi हनुमान चालीसा
श्रीगुरु चरन सरोज रज , निजमन मुकुरु सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुँचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे।
कांधे मूंज जनेउ साजे।।
शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानु।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे।।
असुर निकन्दन राम दुलारे।।
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुह्मरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै।।
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बन्दि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
