Ujjain Mahakal : उज्जैन को मिलेगा नया आध्यात्मिक मुकाम, महाकाल लोक के बाद बनेगा शनि लोक

Edited By Updated: 23 Jan, 2026 01:00 PM

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Ujjain Mahakal : उज्जैन, जिसे बाबा महाकाल की नगरी के रूप में जाना जाता है, हर दिन श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का केंद्र बनता है। न केवल देशभर से, बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में भक्त महाकालेश्वर के दर्शन के लिए उज्जैन आते हैं। वर्ष 2022 में...

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Ujjain Mahakal : उज्जैन, जिसे बाबा महाकाल की नगरी के रूप में जाना जाता है, हर दिन श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का केंद्र बनता है। न केवल देशभर से, बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में भक्त महाकालेश्वर के दर्शन के लिए उज्जैन आते हैं। वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा महाकाल लोक का उद्घाटन किए जाने के बाद शहर की धार्मिक और पर्यटन पहचान को नई दिशा मिली। इसके परिणामस्वरूप उज्जैन में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में काफी वृद्धि हुई, जिससे शहर का विकास भी तेजी से हुआ।

अब उज्जैन की आध्यात्मिक पहचान को और मजबूत करने के लिए एक नई योजना शुरू की जा रही है। महाकाल लोक की तर्ज पर जल्द ही ‘शनि लोक’ का निर्माण होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 8 नवंबर को 9वें अन्नकूट महोत्सव और संध्या भजन के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस परियोजना की घोषणा की। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए 110 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। मध्यप्रदेश सरकार इस प्रोजेक्ट के माध्यम से धार्मिक पर्यटन को और बढ़ावा देने का लक्ष्य रख रही है।

शनि लोक का निर्माण त्रिवेणी क्षेत्र में होगा, जो उज्जैन-इंदौर मार्ग पर स्थित है। यह स्थल शिप्रा नदी के किनारे एक प्राचीन शनि मंदिर के पास है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी। यह मंदिर देश में अनोखा है क्योंकि यहां भगवान शनि की पूजा शिव स्वरूप में की जाती है। विशेष रूप से शनिश्चरी अमावस्या के अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ यहाँ आती है। श्रद्धालु शिप्रा नदी में स्नान करके शनिदेव के दर्शन और पूजा करते हैं।

शनि लोक को महाकाल लोक की तरह एक भव्य धार्मिक कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जाएगा। इस परियोजना की डी.पी.आर तैयार हो चुकी है और टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। सरकार का प्रयास है कि यह स्थल सिंहस्थ कुंभ से पहले तैयार हो जाए।

शनि मंदिर के पुजारी राकेश बैरागी के अनुसार, यह मंदिर लगभग 2000 वर्ष पुराना है। कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य की साढ़ेसाती समाप्त होने के बाद शनिदेव उनकी कृपा से प्रसन्न हुए और सभी ग्रह एक साथ इस स्थान पर प्रकट हुए। तभी से यहां शनि की मुख्य प्रतिमा के साथ ढैय्या शनि की प्रतिमा भी स्थापित है। यह मंदिर विशेष इसलिए भी है क्योंकि यहां शनिदेव शिव रूप में पूजे जाते हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने और साढ़ेसाती या ढैय्या की शांति के लिए यहाँ तेल अर्पित करते हैं।

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