...तो इसलिए नहीं कर सकती कुंवारी कन्याएं शिवलिंग की पूजा !

Edited By Updated: 19 Jul, 2019 04:22 PM

why unmarried girls cannot do shivling puja

हिंदू धर्म के शास्त्रों में परंपराओं, मान्यताओं व नियमों का बहुत महत्व है। इसमें पूजा से लेकर मौत के बाद होने वाले अंतिम संस्कार से भी जुड़ें कई नियम आदि वर्णित हैं।

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हिंदू धर्म के शास्त्रों में परंपराओं, मान्यताओं व नियमों का बहुत महत्व है। इसमें पूजा से लेकर मौत के बाद होने वाले अंतिम संस्कार से भी जुड़ें कई नियम आदि वर्णित हैं। आज हम आपको एक ऐसी है नियम के बारे में जिसके बारे में आधे से ज्यादा लोगों को पता नहीं, तो वहीं जिन्हें पता है वो इस पर विश्वास नहीं करते। तो चलिए जानते हैं क्या है ये नियम इससे जुड़ी खास बातें।    

बहुत से लोग इस बात पर यकीन नहीं करते मगर धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि किसी भी धार्मिक काम को करते समय अगर उनके नियमों का पालन न किया जाए तो नुकसानदेह होता है।

ऐसा ही एक नियम भगवान शिव के रूप ‘शिवलिंग’ से जुड़ा है, जिसके बारे में मान्यता प्रचलित है कि कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग को हाथ नहीं लगा लगाना चाहिए। बल्कि कहा जाता है उनके द्वारा शिवलिंग की पूजा का ख्याल करना भी निषेध है। मगर ऐसा क्यों, इसका क्या कारण है?
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कुछ प्रचलित मान्यताओं के अनुसार लिंगम एक साथ योनि (जो देवी शक्ति का प्रतीक है एवं महिला की रचनात्मक ऊर्जा है) का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि कहा जाता है कि शास्त्रों में ऐसा कुछ नहीं वर्णित। शिवपुराण के अनुसार यह एक ज्योति‍ का प्रतीक है।

सामाजिक धारणाओं की मानें तो शिवलिंग की पूजा केवल पुरुषों के द्वारा ही संपन्न होनी चाहिए न किसी नारी के द्वारा। ज्यादातर देखा जाता है कि महिलाओं को शिवलिंग की पूजा से दूर ही रखा जाता है, खासतौर पर अविवाहित स्त्री का तो शिवलिंग की पूजा करना ही वर्जित माना जाता है।
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किंवदंतियों के अनुसार अविवाहित स्त्री को शिवलिंग के करीब जाने की आज्ञा नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव बेहद गंभीर तपस्या में लीन रहते हैं। किसी स्त्री के कारण उनकी तपस्या भंग न हो, इसका ध्यान रखते हुए ये मान्यता प्रचलित हुई। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमेशा से ही जब भी भगवान शिव की पूजा की जाती है तो विधि-विधान का बहुत ख्याल रखा जाता है। बल्कि कहा जाता है केवल मनुष्य जाति ही नहीं, देवता व अप्सराएं भी भगवान शिव की पूजा करते समय बेहद सावधानी से बरतते हैं।

तो यह इसलिए माना जाता है कहीं देवों के देव महादेव की समाधि किसी स्त्री की वजह से भंग न हो जाए। क्योंकि कहा जाता है जब शिव की समाधि भंग होती है तो वे क्रोधित हो जाते हैं और अपने रौद्र रूप में प्रकट होते हैं जिसे शांत कर पाना किसी असंभव काम के समान हैं। इसी कारण से महिलाओं को शिवलिंग पूजा न करने के लिए कहा गया है।

मगर बता दें कि शिवलिंग की पूजा से अविवाहित स्त्रियों को दूर रखने का अर्थ यह नहीं है कि वे भगवान शिव की पूजा नहीं कर सकतीं। बल्कि कहा जाता है कुंवारी कन्याएं ही शिव जी की सबसे अधिक आराधना करती हैं। अपने लिए एक अच्छे वर की कामना करते हुए वे पूर्ण विधि-विधान से सावन के सोमवार व शिव जी के 16 सोमवार का व्रत रखती हैं।

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