Edited By Mansi,Updated: 06 Aug, 2026 03:30 PM

यहां पढ़ें कैसी है फिल्म आर्यभट्ट का जीरो
फिल्म: आर्यभट्ट का जीरो (Aryabhatt Ka Zero)
कलाकार: हिमांश कोहली (Himansh Kohli), रवि किशन (Ravi Kishan), सोनाली सेहगल (Sonal Sehgal), दर्शना बानिक (Darshana Banik), नीरज सूद (Neeraj Sood, शिल्पा शिंदे (Shilpa Shinde), राजेश शर्मा (Rajesh Sharma)
निर्देशक: कमल चंद्रा (Kamal Chandra)
रेटिंग: 3*
Aryabhatt Ka Zero: बॉलीवुड में संघर्ष और सफलता की कहानियों पर बनी फिल्मों को हमेशा दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है। '12वीं फेल' के बाद अब हिमांश कोहली और सोनाली सेहगल स्टारर 'आर्यभट्ट का जीरो' भी एक ऐसे युवक की कहानी लेकर आई है, जो बार-बार असफल होने के बाद खुद को 'जीरो' समझने लगता है। निर्देशक कमल चंद्रा ने इस फिल्म के जरिए यह बताने की कोशिश की है कि इंसान की पहचान उसकी नाकामियों से नहीं, बल्कि मुश्किल हालात में हार न मानने के जज्बे से होती है। पारिवारिक रिश्तों, इमोशनल पलों और हल्के-फुल्के हास्य के साथ यह फिल्म एक साधारण लड़के के असाधारण सफर को पर्दे पर पेश करती है।
कहानी
फिल्म की शुरुआत फ्लैशबैक से होती है। पहले ही सीन में दिल्ली के मुखर्जी नगर में एक लड़का पुलिस से बचकर भागता नजर आता है। बैकग्राउंड में आवाज सुनाई देती है "कुछ होते हैं नायक, कुछ होते हैं खलनायक और कुछ होते हैं नालायक।"
फिल्म की कहानी ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ बग्गू (हिमांश कोहली) के इर्द-गिर्द घूमती है। बग्गू उत्तराखंड के एक साधारण परिवार का बेरोजगार लड़का है। उसके पिता आर्यभट्ट श्रीवास्तव (नीरज सूद) चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। बग्गू की गर्लफ्रेंड रिंकू (सोनाली सेहगल) की शादी एक एसडीएम से हो जाती है। इससे दुखी होकर वह फैसला करता है कि वह यूपीएससी पास करके डीएम बनेगा। लेकिन किस्मत और उसकी अपनी गलतियां उसे बार-बार पीछे धकेल देती हैं। धीरे-धीरे लोग उसे 'आर्यभट्ट का जीरो' कहने लगते हैं।
पिता की उम्मीदें, समाज के ताने और लगातार मिल रही नाकामियां बग्गू का आत्मविश्वास तोड़ देती हैं। वह खुद को बेकार समझने लगता है। लेकिन जिंदगी में आने वाली कुछ घटनाएं उसकी सोच बदल देती हैं। क्या बग्गू अपने हालात बदल पाता है और जीरो से हीरो बनता है? इसका जवाब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
डायरेक्शन
निर्देशक कमल चंद्रा ने फिल्म को बिना ज्यादा ड्रामा और दिखावे के आम जिंदगी से जोड़कर पेश किया है। यही वजह है कि दर्शक कहानी से आसानी से जुड़ जाते हैं। कहानी का आइडिया नया नहीं है, लेकिन इसे भावनात्मक और दिल को छू लेने वाले अंदाज में दिखाया गया है। फिल्म में पिता और बेटे के रिश्ते को बहुत अच्छे तरीके से दिखाया गया है। लेखक तारिक मोहम्मद की कहानी सरल और असरदार है। फिल्म के किरदार असली लगते हैं और कई संवाद लंबे समय तक याद रह जाते हैं।
अभिनय
हिमांश कोहली ने बग्गू के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। उन्होंने एक ऐसे लड़के की भावनाओं को अच्छी तरह दिखाया है, जो खुद को असफल मानने लगता है। उनके अभिनय में मासूमियत, कॉमेडी और इमोशन तीनों का अच्छा मेल देखने को मिलता है।

रवि किशन अपने देसी अंदाज से फिल्म में मनोरंजन का तड़का लगाते हैं। सोनाली सेहगल ने रिंकू के रोल में अच्छा काम किया है। वहीं दर्शना बानिक अपने छोटे लेकिन असरदार किरदार से ध्यान खींचती हैं। बग्गू के पिता के रोल में नीरज सूद का अभिनय बेहद शानदार है। उनके और हिमांश के बीच के भावुक दृश्य फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनते हैं। अलका अमीन, राजेश शर्मा और शिल्पा शिंदे सहित पूरी सपोर्टिंग कास्ट ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।
फाइनल वर्डिक्ट
'आर्यभट्ट का जीरो' की सबसे बड़ी खासियत इसका आसान और सकारात्मक संदेश है। यह फिल्म उन लोगों की कहानी है, जो जिंदगी में असफल होने के बाद खुद को दूसरों से कम समझने लगते हैं। बग्गू का संघर्ष और उसका सफर फिल्म की जान है, जिसे हिमांश कोहली ने बेहतरीन तरीके से निभाया है। परिवार, रिश्तों, भावनाओं और सफलता के संघर्ष को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने वाली यह एक अच्छी और प्रेरणादायक फिल्म है, जिसे पूरे परिवार के साथ एक बार जरूर देखा जा सकता है।