चीन ने बनाया चावल का क्लोन, किसानों और दुनिया की खेती के लिए कितना फायदेमंद और कितना जोखिम भरा?

Edited By Updated: 26 Jul, 2026 11:06 PM

china has cloned rice

चीन के वैज्ञानिकों ने कृषि क्षेत्र में एक ऐसी सफलता हासिल की है जो पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा और खेती के तरीके को बदल सकती है। चाइना नेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता वांग केजियान की अगुवाई वाली टीम ने हाइब्रिड चावल की क्लोनिंग करने में...

बीजिंग/नई दिल्ली: चीन के वैज्ञानिकों ने कृषि क्षेत्र में एक ऐसी सफलता हासिल की है जो पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा और खेती के तरीके को बदल सकती है। चाइना नेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता वांग केजियान की अगुवाई वाली टीम ने हाइब्रिड चावल की क्लोनिंग करने में कामयाबी पाई है। इस तकनीक के जरिए अब किसानों को हर साल महंगे हाइब्रिड बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे उनकी बीज लागत में 99 प्रतिशत तक की भारी कमी आ सकती है।

HUAXU जीन का कमाल: बिना फर्टिलाइजेशन के पैदा होंगे बीज
'Vita' जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी के अनुसार, वैज्ञानिकों ने चावल के एक विशेष जीन की पहचान की है जिसे "HUAXU" नाम दिया गया है। यह जीन चावल की अंड कोशिकाओं (egg cells) में बिना फर्टिलाइजेशन के ही प्रजनन (पार्थेनोजेनेसिस) शुरू कर सकता है। रिसर्च में पाया गया कि इस तरीके से तैयार किए गए बीज जेनेटिक रूप से अपने 'मदर प्लांट' के बिल्कुल समान होते हैं और अलग-अलग परिस्थितियों में भी इनकी क्लोनिंग क्षमता 99% से ऊपर बनी रही।

किसानों और दुनिया के लिए क्या हैं फायदे?

  1. लागत में भारी बचत: हाइब्रिड बीजों को दोबारा इस्तेमाल करने पर उनकी गुणवत्ता कम हो जाती थी, लेकिन क्लोनिंग तकनीक से किसान उसी फसल के बीज अगले साल भी इस्तेमाल कर सकेंगे। इससे बीजों पर होने वाला खर्च लगभग खत्म हो जाएगा।
  2. पैदावार में स्थिरता: हाइब्रिड चावल के उच्च गुण और अधिक पैदावार की क्षमता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बरकरार रहेगी।
  3. भुखमरी से लड़ने में मदद: विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से वैश्विक चावल उत्पादन दोगुना हो सकता है, जो दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

खतरे की घंटी: सेहत और मिट्टी पर पड़ सकता है बुरा असर
जहां एक ओर यह तकनीक क्रांतिकारी दिख रही है, वहीं इसके खतरनाक पहलू भी सामने आए हैं:

  • बीमारियों का डर: इस क्लोन चावल को खाने से इंसानी सेहत पर बुरा असर पड़ने और बीमारियों की आशंका जताई गई है।
  • जैव विविधता का विनाश: सुपर-चावल के चलन से स्थानीय और पारंपरिक देसी किस्में खत्म हो सकती हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है।
  • फसल बर्बाद होने का रिस्क: आनुवंशिक रूप से एक ही जैसे बीज होने के कारण, अगर कोई नई बीमारी या कीट हमला करता है, तो पूरी की पूरी फसल एक साथ तबाह हो सकती है।
  • आर्थिक उथल-पुथल: बीज उद्योग से जुड़ी कंपनियों और स्थानीय बाजारों का कामकाज ठप हो सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।

क्या भारत की चीन पर बढ़ जाएगी निर्भरता?
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि यह तकनीक भारतीय बाजारों में प्रवेश करती है, तो भविष्य में भारत की चीन पर निर्भरता बढ़ सकती है। जैसे भारत ने अमेरिकी मक्का के मामले में अपनी पैदावार और मिट्टी को बचाने के लिए कड़ा रुख अपनाया था, वैसे ही स्थिति यहां भी बन सकती है। जानकारों का कहना है कि चीन के बीजों के इस्तेमाल से न केवल हमारी पैदावार बल्कि हमारी मिट्टी की उर्वरता भी चीनी तकनीक पर निर्भर हो सकती है।

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