चीन में नया 'राष्ट्रीय एकता कानून' लागू, तिब्बती-उइगरों पर और कसेगा शिकंजा

Edited By Updated: 02 Jul, 2026 07:00 PM

china tells its ethnic minorities to integrate or face consequences with swee

चीन में 1 जुलाई से 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ' (Ethnic Unity and Progress Promotion Law) लागू हो गया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य देश की 56 मान्यता प्राप्त जातीय समुदायों के बीच राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है

International Desk: चीन में 1 जुलाई से 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ' (Ethnic Unity and Progress Promotion Law) लागू हो गया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य देश की 56 मान्यता प्राप्त जातीय समुदायों के बीच राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है। वहीं मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को कमजोर कर सकता है। चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping लंबे समय से तिब्बती, उइगर और अन्य जातीय समुदायों में चीनी राष्ट्रीय पहचान और सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति निष्ठा बढ़ाने की नीति पर जोर देते रहे हैं।

 

नए कानून के जरिए इन नीतियों को कानूनी रूप दिया गया है। कानून के अनुसार, स्कूलों और सरकारी संस्थानों में मंदारिन चीनी को प्राथमिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करना होगा। पाठ्यक्रम में ऐसी शिक्षा देने पर जोर होगा, जिससे विद्यार्थियों में "चीनी राष्ट्र के साझा समुदाय" की भावना विकसित हो। साथ ही अभिभावकों से अपेक्षा की गई है कि वे बच्चों को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और देश से प्रेम करने की शिक्षा दें। नए कानून में संग्रहालयों, पुस्तकालयों और अन्य सांस्कृतिक संस्थानों को चीनी इतिहास और राष्ट्रीय विकास से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन को आवास नीतियों के जरिए विभिन्न जातीय समुदायों के बीच एकीकरण बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

 

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में लोगों के पुनर्वास या स्थानांतरण जैसी नीतियां भी लागू हो सकती हैं। कानून का एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी है कि चीन के बाहर मौजूद ऐसे व्यक्ति या संगठन, जिन्हें बीजिंग "जातीय विभाजन" को बढ़ावा देने वाला मानता है, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है। आलोचकों का कहना है कि इससे विदेशों में रहने वाले तिब्बती, उइगर और अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं तथा संगठनों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अप्रैल में जारी एक पत्र में चेतावनी दी थी कि यह कानून तिब्बती, उइगर और मंगोल समुदायों की भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक स्वायत्तता पर गंभीर असर डाल सकता है।

 

विशेषज्ञों ने यह भी आशंका जताई कि कानून का उपयोग चीन के बाहर रहने वाले लोगों के खिलाफ भी किया जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कानून राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उस व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत राष्ट्रीय पहचान को जातीय पहचान से ऊपर रखा जा रहा है। हालांकि चीन का कहना है कि यह कानून राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।

 
 

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