ट्रांसप्लांट की दुनिया में नया इतिहास; शख्स ने सूअर की किडनी पर जीने का तोड़ा रिकार्ड, लाखों मरीजों में जगी जीवन की नई उम्मीद

Edited By Updated: 06 Sep, 2026 04:57 PM

genetically modified pig kidney keeps man alive for record nine months

अमेरिका में 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज के शरीर में ट्रांसप्लांट की गई जेनेटिकली मॉडिफाइड सूअर की किडनी करीब 271 दिनों तक काम करती रही। इस दौरान उन्हें डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी। बाद में मानव किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। यह सफलता जेनोट्रांसप्लांटेशन को...

Washington: दुनिया में किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे लाखों मरीजों के लिए मेडिकल साइंस से बड़ी उम्मीद सामने आई है। अमेरिका में पहली बार जेनेटिकली मॉडिफाइड सूअर की किडनी ने एक जीवित इंसान के शरीर में करीब 271 दिनों यानी लगभग 9 महीने तक काम किया।  यह किडनी 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज में ट्रांसप्लांट की गई थी। सबसे खास बात यह रही कि इस दौरान उन्हें डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी। बाद में जब मानव डोनर की किडनी उपलब्ध हुई तो डॉक्टरों ने उनका मानव किडनी ट्रांसप्लांट किया।

 

मानव किडनी मिलने तक बनी जीवन की ‘ब्रिज’
टिम एंड्रयूज एंड-स्टेज किडनी डिजीज से जूझ रहे थे। उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए मानव डोनर किडनी मिलने की संभावना बेहद कम थी। ऐसे में जेनेटिकली एडिटेड सूअर की किडनी उनके लिए एक तरह का अस्थायी सहारा यानी ‘ब्रिज’ बनी।  जनवरी 2025 में डॉक्टरों ने उनके शरीर में यह किडनी ट्रांसप्लांट की। करीब नौ महीने तक इसके काम करने के बाद एंड्रयूज को मानव डोनर की किडनी मिल गई और उनका ट्रांसप्लांट किया गया।

 

सूअर की किडनी ने कैसे काम किया
इंसानी शरीर आमतौर पर किसी दूसरी प्रजाति के अंग को बाहरी तत्व मानकर उस पर तेज प्रतिरक्षात्मक हमला कर सकता है। यही वजह है कि पशु से इंसान में अंग प्रत्यारोपण वैज्ञानिकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। इस समस्या को कम करने के लिए वैज्ञानिक सूअरों के कुछ जीन में बदलाव करते हैं। इसका उद्देश्य अंग को इंसानी शरीर के लिए ज्यादा अनुकूल बनाना और ऑर्गन रिजेक्शन की संभावना कम करना है। एंड्रयूज के मामले में इस्तेमाल की गई किडनी भी इसी तरह जेनेटिकली एडिट की गई थी।

 

दुनिया में किडनी डोनर की भारी कमी
किडनी ट्रांसप्लांट की सबसे बड़ी समस्या आज भी डोनर अंगों की कमी है। अमेरिका में करीब एक लाख लोग किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं, जबकि हर साल लगभग 25 हजार ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक लंबे समय से जेनोट्रांसप्लांटेशन पर काम कर रहे हैं। इसमें एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है। अगर यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो भविष्य में मानव अंग मिलने तक गंभीर मरीजों को पशु अंग अस्थायी रूप से उपलब्ध कराया जा सकता है।

 

मरीजों के लिए नई उम्मीद
एंड-स्टेज किडनी डिजीज में मरीजों को अक्सर नियमित डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। मानव किडनी मिलने में लंबा समय लग सकता है और इस दौरान मरीज की स्थिति गंभीर बनी रह सकती है। ऐसे में अगर जेनोट्रांसप्लांटेशन सुरक्षित तरीके से लंबे समय तक काम करने लगे, तो यह डायलिसिस और मानव किडनी ट्रांसप्लांट के बीच एक संभावित विकल्प बन सकता है। हालांकि इस उपलब्धि को अभी नियमित किडनी ट्रांसप्लांट का विकल्प नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिकों को यह साबित करना होगा कि जेनेटिकली मॉडिफाइड पशु अंग लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।  इसके अलावा शरीर की प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रिया, अंग के लंबे समय तक काम करने की क्षमता और पशु से इंसान में संक्रमण फैलने का संभावित जोखिम भी बड़ी चुनौतियां हैं।  इसके लिए बड़े और नियंत्रित क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत होगी।

 

271 दिन की कामयाबी खास क्यों ?
टिम एंड्रयूज का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि जेनेटिकली इंजीनियर किया गया पशु अंग सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही नहीं, बल्कि कई महीनों तक इंसानी शरीर में काम कर सकता है।  यह उपलब्धि अभी मंजिल नहीं है, लेकिन यह उस भविष्य की ओर एक महत्वपूर्ण कदम जरूर है जहां मानव अंग मिलने का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए जान बचाने वाला वैकल्पिक अंग उपलब्ध हो सके।

 

 

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