Edited By Tanuja,Updated: 11 Apr, 2026 11:46 AM

ईरान और अमेरिका के बीच अहम वार्ता के लिए दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच गए हैं। युद्धविराम और क्षेत्रीय शांति पर दुनिया की नजर टिकी है। हालांकि ईरान ने पहले अपनी शर्तें पूरी करने की मांग रखी है, जिससे बातचीत का माहौल संवेदनशील...
International Desk: आंतकियों के आका पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली बहुप्रतीक्षित वार्ता के लिए दोनों देशों के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। इस अहम बातचीत पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे पश्चिम एशिया में जारी तनाव और संघर्ष पर असर पड़ सकता है। ईरान का प्रतिनिधिमंडल मोहम्मद बगेर गालिबफ के नेतृत्व में आया है, जिसमें विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी शामिल हैं। वहीं अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जे डी वेंस इस वार्ता का नेतृत्व कर रहे हैं। शहबाज शरीफ ने इस वार्ता के लिए पहल की और दो हफ्ते के युद्धविराम की घोषणा की थी।
पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और क्षेत्र में शांति बहाल करने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष सकारात्मक और रचनात्मक बातचीत करेंगे। लेकिन पाकिस्तान, जिस पर लंबे समय से आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं, अब खुद को एक “शांति मध्यस्थ” के रूप में पेश कर रहा है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को पनाह देने के आरोप लगे हैं। ऐसे में जब वही देश अब शांति वार्ता का मंच तैयार कर रहा है, तो उसकी नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की “इमेज सुधार” रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
क्या है पाकिस्तान का असली फायदा?
- शहबाज शरीफ की सरकार इस वार्ता के जरिए यह दिखाना चाहती है कि पाकिस्तान अब शांति और कूटनीति का समर्थक है, न कि संघर्ष का।
- अमेरिका-ईरान जैसे बड़े देशों के बीच मध्यस्थता करके पाकिस्तान खुद को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करना चाहता है।
- अगर यह वार्ता सफल होती है, तो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय सहायता, निवेश और कूटनीतिक समर्थन मिलने की संभावना बढ़ सकती है ।
- आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह एक मौका है ।
- वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक संदेश दे और घरेलू दबाव को कम करे।
- अमेरिका की ओर से जे डी वेंस ने साफ संकेत दिया है कि बातचीत “ईमानदारी” पर निर्भर करेगी।
- वहीं ईरान ने पहले ही अपनी शर्तें रख दी हैं, जिससे साफ है कि भरोसे का माहौल अभी भी कमजोर है।
- इस्लामाबाद में हो रही यह वार्ता सिर्फ अमेरिका-ईरान संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की कूटनीतिक परीक्षा भी है।
ईरान की सख्त शर्तें
ईरान ने बातचीत शुरू होने से पहले दो अहम शर्तें रखी हैं कि लेबनान में युद्धविराम लागू हो व ईरान की संपत्तियों पर लगी रोक हटाई जाए
गालिबफ ने साफ कहा कि इन शर्तों के बिना बातचीत शुरू नहीं होनी चाहिए। ईरानी मीडिया ने भी संकेत दिए हैं कि शर्तें पूरी न होने पर वार्ता टल सकती है।
अमेरिका का कड़ा रुख
वार्ता से पहले जे डी वेंस ने कड़ा संदेश देते हुए कहा कि अगर ईरान ईमानदारी से बातचीत करेगा तो स्वागत है, लेकिन किसी तरह का “खेल” खेलने पर अमेरिका भी सख्त जवाब देगा। इस बयान से साफ है कि बातचीत आसान नहीं होने वाली।
इस्लामाबाद बना किला
वार्ता को देखते हुए इस्लामाबाद में सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए हैं।
10,000 से ज्यादा पुलिस और सुरक्षाकर्मी तैनात
पूरे शहर को “रेड अलर्ट” पर रखा गया
क्यों अहम है यह वार्ता?
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष को रोकने की कोशिश
ईरान-इजराइल और लेबनान तनाव का समाधान
वैश्विक तेल बाजार और सुरक्षा पर असर