पाकिस्तान में बाल कैंसर की डरावनी सच्चाई, हर साल दस हजार में से 7000 बच्चे हार जाते जिंदगी से

Edited By Updated: 16 Feb, 2026 05:38 PM

l  less than 30 per cent of children diagnosed with cancer survive in pakistan

पाकिस्तान में हर साल करीब 10,000 बच्चों में कैंसर का पता चलता है, लेकिन 30 प्रतिशत से भी कम बच्चे जीवित रह पाते हैं। देर से पहचान, सीमित इलाज सुविधाएं, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी और आर्थिक मजबूरियां इसकी बड़ी वजह हैं। विशेषज्ञों ने समय पर जांच को...

International Desk: पाकिस्तान में हर साल लगभग 10,000 बच्चों में कैंसर की पहचान होती है, लेकिन इनमें से 30 प्रतिशत से भी कम बच्चे ही जीवित रह पाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, देर से निदान, सीमित इलाज सुविधाएं, प्रशिक्षित डॉक्टरों की कमी और आर्थिक कठिनाइयां इसकी प्रमुख वजह हैं। रविवार को बाल कैंसर पर आयोजित “हेल्थ वाइज” जागरूकता सत्र में विशेषज्ञों ने बताया कि दुनिया भर में हर साल करीब 4 लाख बच्चों और किशोरों को कैंसर होता है, जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत मामले निम्न और मध्यम आय वाले देशों से सामने आते हैं।

 

यह जानकारी पाकिस्तानी अख़बार The Express Tribune ने दी। कार्यक्रम का आयोजन Indus Hospital and Health Network द्वारा किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि विकसित देशों में बाल कैंसर से जीवित रहने की दर 80 से 85 प्रतिशत तक है, जबकि विकासशील देशों में यह दर काफी कम है। बाल हेमेटोलॉजी-ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ Dr Naeem Jabbar ने कहा कि बच्चों में होने वाले अधिकतर कैंसर समय पर इलाज मिलने पर पूरी तरह ठीक हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि बच्चों के कैंसर का आमतौर पर जीवनशैली से कोई संबंध नहीं होता और सही इलाज मिलने पर 85 प्रतिशत तक ठीक होने की संभावना रहती है। डॉ. जब्बार के अनुसार, पाकिस्तान में कम सर्वाइवल रेट की वजह लक्षणों की देर से पहचान, सहायक उपचार की कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, सीमित विशेष केंद्र और इलाज बीच में छोड़ देना है।

 

बच्चों में सबसे आम कैंसर में ल्यूकेमिया, लिम्फोमा, ब्रेन व स्पाइनल ट्यूमर, बोन ट्यूमर, न्यूरोब्लास्टोमा, विल्म्स ट्यूमर और रेटिनोब्लास्टोमा शामिल हैं। इस मौके पर बाल ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ Dr Shumail Ashraf ने बताया कि कराची में उनके विभाग में हर साल करीब 1,000 नए मामले आते हैं। वर्ष 2014 से अब तक 16,000 से ज्यादा बच्चों का इलाज किया जा चुका है। विशेषज्ञों ने दोहराया कि समय पर जांच से जान बचाई जा सकती है और माता-पिता, शिक्षक, डॉक्टर व मीडिया से अपील की कि वे जागरूकता बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाएं, ताकि हर बच्चे को जीवन का समान अवसर मिल सके।

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