बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर नेपाल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ने एकता और शांति पर जोर दिया

Edited By Updated: 01 May, 2026 05:51 PM

nepal leaders highlight harmony and peace on buddha purnima

नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने शुक्रवार को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर कहा कि गौतम बुद्ध के सहिष्णुता और पारस्परिक सद्भावना के मार्गदर्शक सिद्धांतों का पालन करके राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा सकता है। नेपाल गौतम बुद्ध की 2570वीं जयंती मना रहा...

इंटरनेशनल डेस्क: नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने शुक्रवार को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर कहा कि गौतम बुद्ध के सहिष्णुता और पारस्परिक सद्भावना के मार्गदर्शक सिद्धांतों का पालन करके राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा सकता है। नेपाल गौतम बुद्ध की 2570वीं जयंती मना रहा है। माना जाता है कि गौतम बुद्ध का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। अहिंसा और शांति के दूत माने जाने वाले गौतम बुद्ध की जयंती पूरे देश में शांति की आशा के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर बौद्ध भिक्षुओं और लामाओं ने पारंपरिक अनुष्ठान किए।

वहीं, लुंबिनी, 'स्वयंभूनाथ' और 'बौद्धनाथ' जैसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों तथा विभिन्न चैत्य, मठ और विहार में धार्मिक समारोह आयोजित किए गए। राष्ट्रपति पौडेल ने कहा कि धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं के बीच सहिष्णुता और पारस्परिक सद्भावना बनाए रखकर तथा अहिंसा एवं शांति के प्रवर्तक भगवान बुद्ध के संदेशों और मार्गदर्शक सिद्धांतों का पालन करके राष्ट्रीय एकता को और अधिक मजबूत किया जा सकता है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि बुद्ध की जन्मस्थली होना नेपाल के लिए सौभाग्य की बात है और देश हमेशा से शांति और अहिंसा का समर्थक रहा है।

उन्होंने कहा, "बुद्ध का दिखाया रास्ता ज्ञान की खोज के माध्यम से दुखों को समाप्त करने का मार्ग है। जैसे प्रकाश की एक किरण के प्रवेश करते ही अंधेरा खुद-ब-खुद दूर हो जाता है; उसी तरह हमारी यात्रा ज्ञान के प्रकाश की खोज में होनी चाहिए, समस्याओं को हल करने के मार्ग पर होनी चाहिए।" नेपाल स्थित भारतीय दूतावास ने लुंबिनी विकास ट्रस्ट और लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय के सहयोग से बृहस्पतिवार को लुंबिनी में बुद्ध जयंती मनाई। इस अवसर पर छात्रों की एक चित्रकला प्रदर्शनी, बौद्ध भिक्षुओं की प्रार्थना सभा और एक जीवंत सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। 

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