Edited By Pardeep,Updated: 02 Nov, 2026 11:05 PM

दुर्लभ धातुओं (Rare Earths) के बाद अब चीन ने भारी निर्माण उपकरणों को अपना नया रणनीतिक हथियार बना लिया है। बीजिंग ने टनल-बोरिंग मशीनों (TBM) जो दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल 5,000 टन तक की खुदाई मशीनें हैं और उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कंक्रीट का...
नई दिल्ली : दुर्लभ धातुओं (Rare Earths) के बाद अब चीन ने भारी निर्माण उपकरणों को अपना नया रणनीतिक हथियार बना लिया है। बीजिंग ने टनल-बोरिंग मशीनों (TBM) जो दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल 5,000 टन तक की खुदाई मशीनें हैं और उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कंक्रीट का छिड़काव करने वाले उपकरणों के निर्यात पर कड़े नियंत्रण लागू कर दिए हैं। चीन के इस कदम का सीधा असर भारत के रणनीतिक बुनियादी ढांचे के विकास पर पड़ सकता है, विशेषकर भारत-चीन सीमा (LAC) पर चल रहे टनल और रेलवे प्रोजेक्ट्स पर।
सैन्य उपयोग का बहाना, सीमा विवाद से जुड़े क्षेत्रों को बनाया निशाना
चीन ने आधिकारिक तौर पर इन मशीनों के नागरिक के साथ-साथ सैन्य (Dual-use) इस्तेमाल का हवाला दिया है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि "चीन के साथ सीमा विवाद वाले संवेदनशील देशों और क्षेत्रों" पर अधिक कड़े नियम लागू होंगे।
क्लीवलैंड और ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के फेलो काइल चान और बीजिंंग की त्सिंगहुआ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता सुन चेंगहाओ के अनुसार, चीन का केंद्रीय उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उसकी इंजीनियरिंग क्षमताओं का उपयोग अन्य देश अपनी सैन्य अवसंरचना (Military Infrastructure) को मजबूत करने के लिए न कर सकें। भारत वर्तमान में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैन्य लामबंदी का समय घटाने के लिए बड़े पैमाने पर सुरंगों, सड़कों और रेल लाइनों का निर्माण कर रहा है।
स्पेयर पार्ट्स पर भी रोक; बुलेट ट्रेन और मेट्रो प्रोजेक्ट्स पहले भी हुए प्रभावित
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, चीन के ये प्रतिबंध केवल नई मशीनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके कलपुर्जों (Spare Parts) और कंपोनेंट्स पर भी लागू होते हैं। भारी घिसावट के कारण इन मशीनों को लगातार स्पेयर पार्ट्स की जरूरत होती है, जिससे भारत में पहले से मौजूद मशीनों के रखरखाव पर भी बुरा असर पड़ेगा।
यह पहली बार नहीं है जब चीन ने इस प्रकार का अडंगा लगाया हो। वर्ष 2024 में भी चीन ने जर्मन कंपनी हर्पेनक्नेक्ट (Herrenknecht AG) जो अपनी बोरिंग मशीनें चीन में बनाती है,द्वारा भारत को बेची जाने वाली मशीनों की आपूर्ति में देरी कर दी थी। इन मशीनों का उपयोग अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन और दिल्ली मेट्रो जैसे प्राथमिकता वाले प्रोजेक्ट्स में होना था।
भारत का जवाबी रोडमैप: $9.6 बिलियन का निवेश और स्वदेशी निर्माण
चीन की वैश्विक टनलिंग उपकरण बाजार में लगभग 70% की एकाधिकार जैसी हिस्सेदारी है। हालांकि, इस चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने बड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं:
- टनलिंग प्रोजेक्ट्स: केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि भारत अगले पांच वर्षों में टनलिंग पर 9.6 बिलियन डॉलर (लगभग 80,000 करोड़ रुपये) तक का निवेश करने का लक्ष्य रख रहा है।
- प्रोत्साहन योजना (PLI): सरकार स्थानीय स्तर पर टनल बोरिंग मशीनों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए 1.2 बिलियन डॉलर की प्रोत्साहन योजना पर विचार कर रही है।
- निजी क्षेत्र की पहल: देश की दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के अध्यक्ष आर. शंकर रमन के अनुसार, उनकी कंपनी स्वदेशी टनल-बोरर का प्रोटोटाइप विकसित कर रही है। हालांकि, चीनी विनिर्माण के पैमाने और कीमतों से मुकाबला करना शुरुआती चरण में एक चुनौती बना हुआ है।