Property Rules: पिता की संपत्ति पर किसका कितना हक? क्या वाकई एक ही बेटे को मिल सकती है पूरी वसीयत? जानें कानूनी हकीकत

Edited By Updated: 25 Feb, 2026 07:19 PM

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भारत में घर और जमीन को लेकर होने वाले पारिवारिक कलेश किसी से छिपे नहीं हैं। अक्सर यह सवाल गलियों और कोर्ट के गलियारों में गूंजता है कि क्या एक पिता अपनी मर्जी से अपने किसी एक बच्चे को राजा और बाकी को रंक बना सकता है? समाज में यह धारणा आम है कि 'बाप...

नेशनल डेस्क: भारत में घर और जमीन को लेकर होने वाले पारिवारिक कलेश किसी से छिपे नहीं हैं। अक्सर यह सवाल गलियों और कोर्ट के गलियारों में गूंजता है कि क्या एक पिता अपनी मर्जी से अपने किसी एक बच्चे को राजा और बाकी को रंक बना सकता है? समाज में यह धारणा आम है कि 'बाप की संपत्ति है, वो जिसे चाहे दे', लेकिन भारतीय कानून की किताब इस मामले में काफी बारीकी और सख्ती से बात करती है। दरअसल, सारा खेल इस बात पर टिका है कि वह संपत्ति पिता के पास आई कहाँ से है।

स्व-अर्जित संपत्ति: यहां पिता ही 'सुप्रीम कोर्ट' है
अगर किसी पिता ने अपनी दिन-रात की मेहनत, अपनी कमाई या अपनी निजी आय से कोई जमीन, मकान या फ्लैट खरीदा है, तो उसे 'स्व-अर्जित संपत्ति' कहा जाता है। कानूनन इस प्रॉपर्टी पर पिता का एकाधिकार होता है। इस मामले में पिता अपनी इच्छा का मालिक है। वह चाहे तो पूरी संपत्ति किसी एक ही बेटे के नाम कर दे, चाहे तो अपनी बेटियों को दे, या फिर किसी गैर को दान कर दे। इस स्थिति में अन्य बच्चे कानूनी तौर पर पिता को ऐसा करने से नहीं रोक सकते। इसके लिए पिता को बस एक रजिस्टर्ड वसीयत (Will) या गिफ्ट डीड (Gift Deed) की कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। यदि पिता ने वसीयत नहीं की है और उनकी मृत्यु हो जाती है, तभी बच्चों और पत्नी का इसमें बराबर का हिस्सा बनता है।

पैतृक संपत्ति: जहां चाहकर भी नहीं चलती पिता की मनमर्जी
बात जब 'पुरखों की जमीन' या पैतृक संपत्ति की आती है, तो नियम पूरी तरह बदल जाते हैं। पैतृक संपत्ति वह होती है जो पिता को अपने पिता, दादा या परदादा से विरासत में मिली हो और जिसका चार पीढ़ियों तक बंटवारा न हुआ हो। कानून कहता है कि ऐसी संपत्ति पर परिवार के बच्चों का हक उनके जन्म के साथ ही तय हो जाता है। पिता इस पूरी संपत्ति को किसी एक बेटे के नाम नहीं कर सकता। वह केवल अपने हिस्से की संपत्ति पर ही निर्णय ले सकता है। अगर पिता पूरी पैतृक संपत्ति को किसी एक के नाम करना चाहे या बेचना चाहे, तो उसे अपने सभी वारिसों (बेटों और बेटियों) से लिखित सहमति लेनी अनिवार्य है। बिना सबकी रजामंदी के किया गया ऐसा कोई भी फैसला अदालत में चुनौती दिए जाने पर रद्द हो सकता है।

बेटियों का अधिकार: अब कोई भेदभाव नहीं
संपत्ति के मामले में अक्सर बेटियों को किनारे कर दिया जाता है, लेकिन कानूनी हकीकत अब बहुत मजबूत है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (संशोधन) 2005 और 2020 में सुप्रीम कोर्ट के 'विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा' मामले के ऐतिहासिक फैसले ने यह साफ कर दिया है कि पैतृक संपत्ति में बेटियों का दर्जा बिल्कुल बेटों के बराबर है। चाहे बेटी की शादी हो चुकी हो या न हुई हो, वह जन्म से ही 'कॉपरसेनर' (सह-पंजीकृत वारिस) है। पिता वसीयत के जरिए भी बेटी को उसके पैतृक अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।

 कब और कैसे संभव है एक बेटे के नाम पूरी प्रॉपर्टी?
संक्षेप में कहें तो, एक पिता तभी पूरी प्रॉपर्टी एक बेटे को दे सकता है जब वह उसकी अपनी कमाई से खरीदी गई हो। पैतृक संपत्ति के मामले में ऐसा करना नामुमकिन है जब तक कि बाकी भाई-बहन खुद अपना हिस्सा छोड़ने को तैयार न हों। यदि पिता बिना वसीयत किए दुनिया छोड़ देते हैं, तो कानून 'उत्तराधिकार' के आधार पर उनकी खुद की कमाई हुई संपत्ति को भी पत्नी और सभी बच्चों में बराबर बाँट देता है।

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