Edited By Rohini Oberoi,Updated: 21 Apr, 2026 01:13 PM

बंबई हाई कोर्ट ने भारत के खेल इतिहास के गुमनाम नायक पहलवान खाशाबा दादासाहेब जाधव को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने के मामले में केंद्र सरकार को कड़ी हिदायत दी है। हाई कोर्ट ने केंद्र को 4 मई तक का अल्टीमेटम दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि...
नेशनल डेस्क। बंबई हाई कोर्ट ने भारत के खेल इतिहास के गुमनाम नायक पहलवान खाशाबा दादासाहेब जाधव को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने के मामले में केंद्र सरकार को कड़ी हिदायत दी है। हाई कोर्ट ने केंद्र को 4 मई तक का अल्टीमेटम दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार इस विषय पर 4 मई तक अपना अंतिम फैसला सुनाए। इस आदेश के बाद अब यह उम्मीद जगी है कि 1952 में देश का नाम रौशन करने वाले जाधव को उनके निधन के 40 साल बाद सर्वोच्च सम्मान मिल सकेगा।
वहीं न्यायमूर्ति माधव जामदार और न्यायमूर्ति प्रवीण पाटिल की पीठ ने 'कुश्तीवीर खाशाबा जाधव फाउंडेशन' द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। पीठ ने कड़े शब्दों में कहा, कोई दो राय नहीं है कि महाराष्ट्र के लाल खाशाबा जाधव स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा में ओलंपिक पदक जीता था। अदालत ने गृह मंत्रालय (पद्म पुरस्कार प्रकोष्ठ) को निर्देश दिया है कि वह इस सम्मान के लिए पुराने आवेदनों पर पुनर्विचार करे और नई परिस्थितियों के आधार पर फैसला ले।
जानें कौन थे खाशाबा जाधव?
खाशाबा जाधव ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक खेलों में कुश्ती (बेंटमवेट श्रेणी) में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। उन्होंने बेहद अभावों और सीमित सुविधाओं के बावजूद तिरंगे का मान बढ़ाया। बता दें कि जाधव का निधन 1984 में हो गया था। उन्हें उनके योगदान के लिए साल 2001 में मरणोपरांत अर्जुन पुरस्कार दिया गया था जिसे उनके समर्थकों ने उनकी कद के मुकाबले बहुत कम माना।
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पिता के सम्मान के लिए बेटे की लंबी लड़ाई
खाशाबा जाधव के बेटे रणजीत जाधव ने अपने पिता को उचित सम्मान दिलाने के लिए 'कुश्तीवीर खाशाबा जाधव फाउंडेशन' बनाया। याचिका में दावा किया गया कि परिवार ने कई बार केंद्र सरकार को आवेदन दिए लेकिन हर बार उन्हें नजरअंदाज किया गया। थक-हारकर फाउंडेशन ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
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फिलहाल हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 मई को तय की है। अब सबकी नजरें केंद्र सरकार के 4 मई के फैसले पर टिकी हैं। यदि सरकार सकारात्मक फैसला लेती है तो यह भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।