छठ पूजा में नाक से मांग तक सिंदूर क्यों लगाया जाता है? जानें धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

Edited By Updated: 25 Oct, 2025 03:47 PM

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छठ पूजा में नारंगी सिंदूर का महत्व महिलाओं की आस्था, प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। नाक से मांग तक सिंदूर लगाने की परंपरा पौराणिक कथाओं और महाभारत की घटनाओं से जुड़ी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह अजना चक्र को सक्रिय कर मानसिक शांति और सकारात्मक...

नेशनल डेस्क : छठ पूजा, जो बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है, में महिलाओं की पारंपरिक सजावट में सिंदूर का विशेष स्थान है। इस पर्व के दौरान व्रती महिलाएं नाक से मांग तक नारंगी सिंदूर लगाती हैं, जिसके पीछे धार्मिक मान्यताएं, पौराणिक कथाएं और वैज्ञानिक कारण जुड़े हैं। यह परंपरा न केवल सोलह शृंगार का हिस्सा है, बल्कि पति की लंबी आयु, प्रेम, सम्मान और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी मानी जाती है।

हिंदू धर्म में सिंदूर का महत्व
हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए मांग में सिंदूर लगाना वैवाहिक जीवन का प्रतीक है। मान्यता है कि जितना लंबा सिंदूर, उतनी ही लंबी पति की आयु होगी। यह प्रेम, समर्पण और खुशहाल दांपत्य जीवन का संदेश देता है। सामान्य दिनों में लाल सिंदूर का प्रयोग होता है, जो निष्ठा और प्रेम का प्रतीक है, लेकिन छठ पूजा में नारंगी सिंदूर का विशेष महत्व है।

लाल और नारंगी सिंदूर में अंतर
छठ पूजा में नारंगी सिंदूर का उपयोग सूर्य देव के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है, क्योंकि यह पर्व सूर्य उपासना का है। नारंगी रंग सूर्य का प्रतीक माना जाता है, जो ऊर्जा, पवित्रता और सकारात्मकता का संचार करता है। इसलिए, व्रती महिलाएं इस पर्व पर नाक से मांग तक नारंगी सिंदूर लगाकर सूर्य देव की कृपा और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

पौराणिक कथा
नाक से मांग तक सिंदूर लगाने की परंपरा के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार, वीरवान नामक एक वीर शिकारी ने धीरमति नामक युवती को जंगली जानवरों से बचाया। दोनों एक साथ रहने लगे, लेकिन जंगल में रहने वाले कालू नामक व्यक्ति को उनका साथ पसंद नहीं था। एक दिन शिकार के दौरान कालू ने वीरवान पर हमला कर उसे घायल कर दिया। धीरमति ने अपनी बहादुरी से कालू का अंत किया। वीरवान ने धीरमति की वीरता की प्रशंसा करते हुए उसके माथे पर खून से सने हाथ रखे, जिससे उसका माथा और ललाट लाल हो गया। तभी से नाक से मांग तक सिंदूर लगाना वीरता, प्रेम और सम्मान का प्रतीक बन गया।

महाभारत से जुड़ी कथा
महाभारत काल की एक अन्य कथा के अनुसार, जब दुःशासन ने द्रौपदी को सभा में घसीटने की कोशिश की, तब द्रौपदी ने बिना शृंगार किए सभा में जाने से इनकार किया। संकट के समय उन्होंने जल्दबाजी में सिंदूर दानी को अपने सिर पर पलट लिया, जिससे सिंदूर उनकी नाक तक लग गया। इसके बाद से नाक तक लंबा सिंदूर लगाना सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक माना जाने लगा। द्रौपदी ने वस्त्र हरण के बाद बाल खुले रखे और हमेशा नाक तक सिंदूर लगाया।

वैज्ञानिक महत्व
नाक से माथे तक का हिस्सा ‘अजना चक्र’ से जुड़ा होता है, जिसे सक्रिय करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और एकाग्रता में वृद्धि होती है। इसलिए, नाक से मांग तक सिंदूर लगाने की परंपरा न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी लाभकारी मानी जाती है। छठ पूजा में नारंगी सिंदूर की यह परंपरा न केवल आस्था और संस्कृति को दर्शाती है, बल्कि महिलाओं के साहस, प्रेम और समर्पण को भी उजागर करती है।

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