Garud Puran : आखिर क्यों महिलाओं को श्मशान घाट जाने से रोका जाता है? जाने इसके पीछे का धार्मिक कारण

Edited By Updated: 23 Mar, 2026 04:53 PM

garud puran why are women traditionally not allowed at cremation grounds

हिंदू परंपराओं में महिलाओं के श्मशान जाने को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित रही हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, महिलाओं को भावुक माना गया है और अत्यधिक विलाप आत्मा की शांति में बाधा बन सकता है। साथ ही श्मशान के वातावरण और नकारात्मक ऊर्जा से बचाने के...

नेशनल डेस्क : जब किसी व्यक्ति का निधन होता है, तो हिंदू धर्म में उसके शरीर का अंतिम संस्कार करके उसे पंचतत्व में विलीन किया जाता है। परंपरागत रूप से इस प्रक्रिया में पुरुषों की भागीदारी अधिक देखी जाती है, जबकि महिलाओं के श्मशान घाट जाने को लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित रही हैं। हालांकि, समय के साथ इन परंपराओं में बदलाव भी देखने को मिल रहा है।

धार्मिक मान्यताओं में क्या कहा गया है?

धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में श्मशान से जुड़ी कई मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि अंतिम संस्कार के दौरान वातावरण गंभीर और संवेदनशील होता है, जहां भावनाओं पर नियंत्रण रखना जरूरी माना गया है।

महिलाओं के श्मशान न जाने के पीछे कारण

परंपराओं के अनुसार, महिलाओं को अधिक भावुक माना गया है। यह विश्वास है कि श्मशान घाट पर अत्यधिक विलाप या रोना-धोना आत्मा की शांति में बाधा बन सकता है। कहा जाता है कि इससे मृतक की आत्मा का मोह बढ़ सकता है, जिससे उसे आगे की यात्रा में कठिनाई हो सकती है।

इसके अलावा, दाह संस्कार के दौरान कुछ ऐसे दृश्य और ध्वनियां उत्पन्न हो सकती हैं, जो मानसिक रूप से असहज कर सकती हैं। पुराने समय में इन्हीं कारणों से महिलाओं को इन परिस्थितियों से दूर रखने की परंपरा बनी।

नकारात्मक ऊर्जा से जुड़ी मान्यताएं

कुछ मान्यताओं के अनुसार, श्मशान घाट को ऐसा स्थान माना गया है जहां नकारात्मक ऊर्जा या शक्तियों का प्रभाव हो सकता है। माना जाता है कि महिलाएं इन प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, इसलिए उन्हें वहां जाने से रोका जाता था। हालांकि, यह पूरी तरह आस्था और परंपराओं पर आधारित विचार हैं।

क्या महिलाएं अंतिम संस्कार कर सकती हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि परिवार में कोई पुरुष सदस्य मौजूद न हो, तो महिलाएं जैसे पत्नी, बेटी या बहन अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभा सकती हैं। गरुड़ पुराण के प्रेत खंड में इसका उल्लेख मिलता है कि ऐसी स्थिति में महिलाओं को यह अधिकार दिया गया है। अगर परिवार में कोई भी सदस्य उपलब्ध न हो, तो समाज का कोई जिम्मेदार व्यक्ति अंतिम संस्कार कर सकता है।

बदलता समय और नई सोच

आज के समय में समाज में बदलाव आ रहा है और कई जगहों पर महिलाएं भी अंतिम संस्कार में भाग ले रही हैं। लोग अब परंपराओं को अपनी समझ और परिस्थितियों के अनुसार अपनाने लगे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सामाजिक सोच भी समय के साथ बदलती रहती है।

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