Edited By Mansa Devi,Updated: 25 Feb, 2026 12:07 PM

शेयर बाजार और कीमती धातुओं में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच बेस मेटल्स, खासतौर पर कॉपर, निवेशकों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कॉपर की कीमतों में हाल के दिनों में अच्छी तेजी दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञ इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा का संकेत...
नेशनल डेस्क: शेयर बाजार और कीमती धातुओं में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच बेस मेटल्स, खासतौर पर कॉपर, निवेशकों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कॉपर की कीमतों में हाल के दिनों में अच्छी तेजी दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञ इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा का संकेत मानते हैं। इसी वजह से कॉपर को “डॉक्टर कॉपर” भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी मांग और कीमतें दुनिया भर में औद्योगिक गतिविधियों की स्थिति को दर्शाती हैं। जानकारों का मानना है कि 2026 कॉपर के लिए महत्वपूर्ण साल हो सकता है, क्योंकि इसकी मांग पारंपरिक उद्योगों से आगे बढ़कर नई तकनीकों और हरित ऊर्जा से जुड़ गई है।
MCX पर कॉपर की ताजा स्थिति
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी Multi Commodity Exchange of India (MCX) पर कॉपर की कीमतों में मजबूती बनी हुई है। 27 फरवरी एक्सपायरी वाले कॉन्ट्रैक्ट में कॉपर का भाव 1,178 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार करता देखा गया, जो पिछले बंद भाव 1,168.45 रुपये से करीब 0.82 प्रतिशत अधिक है। कारोबारी सत्र के दौरान कीमतें लगभग 1,185 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचीं। यह तेजी बाजार में बढ़ती मांग और सप्लाई से जुड़ी चिंताओं को दिखाती है।
नई तकनीक और हरित ऊर्जा से बढ़ी मांग
कॉपर की तेजी के पीछे कई बड़े कारण हैं। दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन बढ़ रहा है। एक इलेक्ट्रिक कार में पारंपरिक पेट्रोल या डीजल कार की तुलना में तीन से चार गुना अधिक कॉपर का उपयोग होता है। इसके अलावा सोलर पैनल और विंड टर्बाइन जैसे रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स में भी बड़ी मात्रा में कॉपर की जरूरत पड़ती है। जैसे-जैसे देश स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं, कॉपर की खपत लगातार बढ़ रही है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भी कॉपर की मांग को सहारा दे रहा है। बड़े डेटा सेंटरों में बिजली की आपूर्ति, वायरिंग और कूलिंग सिस्टम के लिए कॉपर का व्यापक इस्तेमाल होता है। तकनीकी क्षेत्र में निवेश बढ़ने से इस धातु की खपत और तेज हुई है।
सप्लाई पर दबाव और वैश्विक असर
कॉपर उत्पादन करने वाले प्रमुख देशों, जैसे चिली और पेरू, में खनन संबंधी चुनौतियां सामने आ रही हैं। नई खदानों के विकास की रफ्तार धीमी है और कई जगह संचालन संबंधी बाधाएं हैं। इससे वैश्विक बाजार में सप्लाई पर दबाव बना हुआ है। मांग बढ़ने और आपूर्ति सीमित रहने की स्थिति ने कीमतों को ऊपर की ओर धकेला है।
चीन, जो दुनिया का बड़ा औद्योगिक उपभोक्ता है, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों में तेजी से भी कॉपर की मांग बढ़ी है। अमेरिकी नीतियों, खासकर रिफाइंड कॉपर पर प्रस्तावित टैरिफ की खबरों ने भी बाजार में स्टॉक जमा करने की प्रवृत्ति को बढ़ाया है, जिससे कीमतों को अतिरिक्त समर्थन मिला है।
निवेश के रास्ते और जरूरी सावधानी
कॉपर की इस तेजी का फायदा उठाने के लिए निवेशकों के पास अलग-अलग विकल्प मौजूद हैं। कमोडिटी बाजार में सीधे फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के जरिए निवेश किया जा सकता है। इसके अलावा कॉपर उत्पादन और प्रोसेसिंग से जुड़ी कंपनियों जैसे Hindustan Copper Limited, Vedanta Limited और Hindalco Industries के शेयरों में निवेश कर भी अप्रत्यक्ष रूप से इसका लाभ लिया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉपर आधारित ETF और कमोडिटी फंड भी एक विकल्प हो सकते हैं।
हालांकि निवेश से पहले जोखिम को समझना बेहद जरूरी है। कमोडिटी बाजार में कीमतें तेजी से बदलती हैं। यदि वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी आती है और औद्योगिक गतिविधियां घटती हैं, तो कॉपर की मांग कम हो सकती है और कीमतों में गिरावट आ सकती है। इसके अलावा यदि कॉपर बहुत महंगा हो जाता है, तो उद्योग एल्युमीनियम जैसे विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं।