Edited By Radhika,Updated: 03 Jan, 2026 04:58 PM

वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज वर्तमान समय में भारत के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक मार्गदर्शकों में से एक हैं। उनके सादे जीवन और खरी बातों ने लाखों युवाओं और श्रद्धालुओं को प्रभावित किया है।
Premanand Maharaj: वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज वर्तमान समय में भारत के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक मार्गदर्शकों में से एक हैं। उनके सादे जीवन और खरी बातों ने लाखों युवाओं और श्रद्धालुओं को प्रभावित किया है। वे अक्सर अपने भक्तों के सवालों के जवाब देते हैं। हाल ही में संत प्रेमानंद महाराज ने हाल ही में एक श्रद्धालु के प्रश्न का समाधान करते हुए जीवन जीने की सही कला सिखाई। श्रद्धालु ने पूछा था कि मृत्यु के समय मन को ग्लानि और पछतावे से कैसे बचाया जाए? तो महाराज जी ने बड़ी सहजता से इसका उत्तर दिया।
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अंतिम समय में आते हैं ऐसे विचार
महाराज जी ने बड़े सरल शब्दों में समझाया कि मृत्यु के समय वही विचार मन में आते हैं, जिनका हमने जीवन भर अभ्यास किया होता है। उन्होंने कहा, "यह सोचना एक बड़ी भूल है कि हम जीवन भर मनमानी करेंगे और अंतिम क्षण में भगवान का नाम ले लेंगे। अंत समय में वही स्मृति उभरती है जो मन में गहराई से बसी हो। यदि जीवन भर गलत आचरण किया है, तो अंत में शांति मिलना असंभव है।"

हर सांस बने प्रार्थना
प्रेमानंद महाराज के अनुसार पछतावे से बचने का एकमात्र तरीका 'वर्तमान' को संवारना है। आदर्श स्थिति यह है कि भक्ति का अभ्यास बचपन से हो। यदि बचपन निकल गया है, तो जो समय हाथ में है उसे व्यर्थ न गंवाएं। हर सांस के साथ ईश्वर के नाम का जप करने की आदत डालें। जब नाम जप सांसों में घुल जाता है, तो मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
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मौत जब उत्सव बन जाए
महाराज जी ने कहा कि जो व्यक्ति हर पल अपने इष्ट (प्रिय-प्रियतम) की याद में रहता है, उसके लिए मृत्यु कोई दुखद अंत नहीं, बल्कि एक 'महोत्सव' बन जाती है। उन्होंने आगाह किया कि हम नहीं जानते कि कौन सी सांस अंतिम होगी, इसलिए हर पल को ईश्वर के स्मरण में बिताना ही सबसे बड़ी समझदारी और 'पछतावा-मुक्त' जीवन की गारंटी है।