Edited By Sanjeev,Updated: 14 Aug, 2026 01:02 PM
वैज्ञानिकों को हमेशा से परेशान करने वाले सबसे पुराने रहस्यों में से एक यह है कि सूरज का बाहरी वायुमंडल (कोरोना) उसकी सतह से लाखों डिग्री ज्यादा गर्म कैसे है। और बार-बार होने वाले विस्फोटों के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा खोने के बावजूद कोरोना इतना...
नई दिल्ली : वैज्ञानिकों को हमेशा से परेशान करने वाले सबसे पुराने रहस्यों में से एक यह है कि सूरज का बाहरी वायुमंडल (कोरोना) उसकी सतह से लाखों डिग्री ज्यादा गर्म कैसे है। और बार-बार होने वाले विस्फोटों के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा खोने के बावजूद कोरोना इतना गर्म कैसे बना रहता है?
भारत के एस्ट्रोफिजिसिस्ट का कहना है कि देश के पहले सोलर ऑब्जर्वेशन मिशन, आदित्य-L1 से मिली नई जानकारियों ने उन्हें इन रहस्यों को सुलझाने के लिए कुछ अहम सुराग दिए हैं। उनकी खोजें प्रतिष्ठित 'एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स' में छपे एक हालिया पेपर में बताई गई हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) के प्रमुख भारतीय सोलर एस्ट्रोफिजिस्ट प्रो. आर. रमेश, जिन्होंने इस स्टडी का नेतृत्व किया, का कहना है कि सूरज के अलग-अलग हिस्सों में तापमान का अंतर फिजिक्स के नियमों को चुनौती देता है।
अगर आप सूरज की परतों को काटें, तो सबसे अंदर कोर होता है जहां तापमान 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस होता है। बाहर की तरफ सतह या फोटोस्फीयर (वह हिस्सा जो हमें पृथ्वी से दिखता है) तक जाने पर तापमान लगभग 5,500 डिग्री सेल्सियस होता है। कोर से बहुत दूर सूरज की सबसे बाहरी परत या कोरोना होती है, जहां तापमान लगभग 2 मिलियन डिग्री सेल्सियस होता है जो कभी-कभी यह 40 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक भी जा सकता है।
प्रो. रमेश कहते हैं कि कोरोना ही वह जगह है जहां सोलर फ्लेयर्स और कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs) जैसी भयंकर घटनाएं होती हैं, जिनके दौरान सूरज से भारी मात्रा में ऊर्जा अंतरिक्ष में निकलती है। CMEs से खूबसूरत 'ऑरोरा' बनते हैं, और वे जियोमैग्नेटिक तूफान पैदा करके पृथ्वी पर जीवन को भी प्रभावित कर सकते हैं जिससे पावर ग्रिड ठप हो सकते हैं और मौसम व कम्युनिकेशन सैटेलाइट पर असर पड़ सकता है।
सामान्य या कम गतिविधि वाले समय में सूरज हर दिन दो से तीन CME छोड़ता है। अधिकतम सोलर गतिविधि चक्र के दौरान (जो हर 11 साल में आता है) एक ही दिन में 10 या उससे ज्यादा CME हो सकते हैं। प्रो. रमेश कहते हैं, 'अब अगर सूरज हर CME के साथ इतनी भारी मात्रा में ऊर्जा खो रहा है और वह वापस नहीं मिल रही है, तो हमारे सौर मंडल के केंद्र में मौजूद यह तारा अपनी सारी ऊर्जा खो देगा और पृथ्वी हमेशा के लिए गहरी ठंड की चपेट में आ जाएगी।'
चूंकि ऐसा नहीं हो रहा है, इसका मतलब है कि कोई "मैकेनिज्म" है जिससे कोरोना अपना इतना ज्यादा तापमान बनाए रखने में कामयाब रहता है। वैज्ञानिक इसके लिए दो वजहें बताते हैं जिसमें पहली, सूरज की सतह पर उबलने जैसी हलचल से लगातार लहरें बनती हैं। ये लहरें बाहर की ओर बढ़ते हुए कोरोना तक ऊर्जा पहुंचाती हैं - ठीक वैसे ही जैसे समुद्र की लहरें झाग और बुलबुले को किनारे तक ले जाती हैं।
दूसरी वजह है सूरज के वायुमंडल में 'उलझी हुई मैग्नेटिक फील्ड लाइनें' (चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं), जो लगातार टूटती और फिर जुड़ती रहती हैं। प्रोफ़ेसर रमेश कहते हैं कि CME तब होता है जब ये मुड़ी-तुड़ी और लूप बनाती लाइनें - जो गुंथे हुए बालों जैसी दिखती हैं - टूटती हैं और अंतरिक्ष में मैग्नेटाइज्ड प्लाज्मा और गैस के विशाल बादल छोड़ती हैं। ये अक्सर सनस्पॉट के पास बनती हैं; ये सूरज पर गहरे रंग के ठंडे हिस्से होते हैं जहां मैग्नेटिक फील्ड बहुत मजबूत होती है। वे आगे कहते हैं, 'लेकिन फिर ये लाइनें दोबारा जुड़ जाती हैं और सूरज कुछ ही घंटों में खोई हुई ऊर्जा को फिर से हासिल कर लेता है।'
अपने रिसर्च पेपर में प्रोफेसर रमेश कहते हैं कि वे यह पता लगाने में कामयाब रहे हैं कि दोनों सिस्टम में से कौन सा कोरोना को कितनी ऊर्जा देता है - इससे यह भी पता चलता है कि कोरोना शुरू में इतना गर्म क्यों होता है और लगातार ऊर्जा खोने के बाद भी अपना तापमान कैसे बनाए रखता है।
वे कहते हैं कि उनकी स्टडी से साफ पता चलता है कि दूसरा सिस्टम ही ज्यादातर ऊर्जा देता है। हालांकि सूरज की सतह पर उबलने जैसी हलचल से बनने वाली लहरें ऊर्जा पैदा करती हैं और उसे आगे पहुंचाती हैं, लेकिन उनका योगदान बहुत कम होता है - वे कुल ऊर्जा जरूरत का सिर्फ 7% ही देती हैं। बाकी 93% ऊर्जा इसलिए मिलती है क्योंकि सूरज खुद को फिर से व्यवस्थित करता है और खोई हुई ऊर्जा को वापस पा लेता है।'
इस हिसाब-किताब तक पहुंचने के लिए प्रोफ़ेसर रमेश कहते हैं कि उन्होंने 5 अगस्त 2024 को हुए एक "बहुत ज्यादा ऊर्जा वाले" CME की स्टडी की। इसके उत्सर्जन (एमिशन) को आदित्य-L1 के कोरोनाग्राफ 'Velc' (विज़िबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ़) ने रिकॉर्ड किया। उन्होंने कहा, 'हमने देखा कि CME के 10 घंटे बाद उलझी हुई फील्ड लाइनें अपनी मूल जगह पर वापस आ गईं, वे फिर से जुड़ गईं और कोरोना की ऊर्जा का पुनर्गठन (रीकॉन्फिगरेशन) हो गया।'
उन्होंने कहा, 'हम मानते हैं कि उबलने जैसी हलचल से पैदा होने वाली ऊर्जा इसमें अहम भूमिका निभाती है, लेकिन हमारे पास सबूत हैं कि यह काफी नहीं है। हमारी स्टडी से पता चलता है कि सूरज पर हर जगह मैग्नेटिक फील्ड लाइन्स का टूटना और फिर से जुड़ना ही ज्यादातर एनर्जी सप्लाई करने का मुख्य जरिया है।'
प्रोफ़ेसर रमेश कहते हैं कि ये डेटा, सूरज के एटमॉस्फेयर में एनर्जी पैदा करने के संभावित तरीकों पर भविष्य की स्टडीज के लिए 'एक अहम बेंचमार्क' देते हैं। वे कहते हैं, 'मुझे लगता है कि इनसे फिजिक्स के उन बुनियादी सवालों के जवाब मिल सकते हैं जो लॉजिक से परे हैं।'