Edited By SHUKDEV PRASAD,Updated: 28 Feb, 2026 07:12 PM

महाराष्ट्र में एक अहम प्रशासनिक फैसले ने सियासी और नौकरशाही गलियारों में हलचल मचा दी है। राज्य सरकार ने एक वरिष्ठ IAS अधिकारी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अन्य अधिकारी को निलंबित कर दिया है।
नेशनल डेस्क: महाराष्ट्र में एक अहम प्रशासनिक फैसले ने सियासी और नौकरशाही गलियारों में हलचल मचा दी है। राज्य सरकार ने एक वरिष्ठ IAS अधिकारी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अन्य अधिकारी को निलंबित कर दिया है। आरोप है कि ये अधिकारी पर्यावरण मंत्री की बुलाई गई अहम बैठक में शामिल नहीं हुए थे।
मामला क्या है?
गुरुवार (27 फरवरी 2026) को विधानसभा में चंद्रपुर जिले में बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे पर चर्चा हो रही थी। इस दौरान राज्य की पर्यावरण मंत्री पंकजा मुंडे ने सदन में बताया कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) के वरिष्ठ अधिकारी बार-बार बुलाने के बावजूद समीक्षा बैठक में शामिल नहीं हुए।
मंत्री ने कहा कि बैठक प्रदूषण से जुड़े सवालों की तैयारी के लिए बुलाई गई थी, लेकिन अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण वह विस्तृत जानकारी प्रस्तुत नहीं कर सकीं। उनके मुताबिक, अधिकारियों को रिमाइंडर भी भेजे गए थे, फिर भी वे उपस्थित नहीं हुए।
विधानसभा में कड़ी टिप्पणी
इस मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रोटेम स्पीकर दिलीप लांडे ने इसे “गंभीर लापरवाही” और “विधानसभा का अपमान” करार दिया। उन्होंने कहा कि चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है और इस तरह की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है।
किन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई?
अगले ही दिन, शनिवार (28 फरवरी 2026) को राज्य सरकार ने ऑल इंडिया सर्विसेज (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स, 1969 के तहत सस्पेंशन आदेश जारी कर दिया।
निलंबित अधिकारियों में शामिल हैं:
- एम. देवेंद्र सिंह – 2011 बैच के IAS अधिकारी और MPCB के मेंबर सेक्रेटरी
- सतीश पडवाल – MPCB के जॉइंट डायरेक्टर
दोनों का निलंबन तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है और उनके खिलाफ विभागीय जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह निर्णय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मंजूरी के बाद लिया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज
इस कार्रवाई पर सियासी प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। भाजपा विधायक सुधीर मुंगंटीवार ने इसे लोकतंत्र के खिलाफ बताते हुए विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की बात कही।वहीं, यह भी चर्चा में है कि MPCB की अध्यक्षता शिवसेना (शिंदे गुट) के नेता सिद्धेश कदम के पास है, जबकि विभाग भाजपा मंत्री के अधीन है। ऐसे में गठबंधन सरकार के भीतर समन्वय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह घटना नौकरशाही और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच जवाबदेही के संतुलन पर नई बहस छेड़ रही है। क्या यह फैसला प्रशासनिक अनुशासन का सख्त संदेश है या राजनीतिक दबाव का उदाहरण? फिलहाल, विभागीय जांच के नतीजे आने तक यह मामला राज्य की राजनीति और प्रशासन में चर्चा का विषय बना रहेगा।